इस बारे में अंतिम कहानी जानने से पहले हर किसी के मन में यही सवाल उठेंगे कि आखिर महाभारत युद्ध में अश्वत्थामा के साथ ऐसा क्या हुआ था? क्या वह अन्य योद्धाओ की तरह युद्ध में वीरगति को प्राप्त नहीं हो पाया या फिर उसे जीवनभर भटकने का शाप मिला था? वह पिसावा के जंगलों में भटक रहे हैं तो स्थानीय लोगों को तो कोई नुकसान नहीं होता? तगडे़ बंम्बे में कितने जहरीले जीव रहते हैं झाडियों से सटे? जाहिर है आपके द्वारा देखे गए ग्रंथों में अर्जुन, कर्ण, श्रीकृष्ण, भीम, भीष्म, दोर्णाचार्य और दुर्योधन जैसे महारथी हो वहां अश्वत्थामा पर बहुत ही कम ध्यान गया होगा। लेकिन अश्वत्थामा महाभारत के ऐसे पात्र रहे हैं जो यदि चाहते, तो युद्ध के स्वरूप को ही बदल सकते थे।
1. अश्वथामा – ग्रंथों में भगवान शंकर के अनेक अवतारों का वर्णन भी मिलता है। उनमें से एक अवतार ऐसा भी है, जो आज भी पृथ्वी पर अपनी मुक्ति के लिए भटक रहा है। ये अवतार हैं गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का। द्वापरयुग में जब कौरव व पांडवों में युद्ध हुआ था, तब अश्वत्थामा ने कौरवों का साथ दिया था। महाभारत के अनुसार अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के सम्मिलित अंशावतार थे। अश्वत्थामा अत्यंत शूरवीर, प्रचंड क्रोधी स्वभाव के योद्धा थे। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने ही अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था। अश्वथाम के संबंध में एक प्रचलित मान्यता… “मध्य प्रदेश के बुरहानपुर शहर से 20 किलोमीटर दूर एक किला है। इसे असीरगढ़ का किला कहते हैं। इस किले में भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है। यहां के स्थानीय निवासियों का कहना है कि अश्वत्थामा प्रतिदिन इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा करने आते हैं।”
2. गुरु द्रोणाचार्य की मृत्युः बात हजारों बरस पहले सतयुग में महाभारत के युद्ध के दिनों की है जब भीष्म पितामह की तरह गुरु द्रोणाचार्य भी पाण्डवों के विजय में सबसे बड़ी बाधा बनते जा रहे थे. श्रीकृष्ण जानते थे कि गुरु द्रोण के जीवित रहते पाण्डवों की विजय असम्भव है. इसलिए श्रीकृष्ण ने एक योजना बनाई जिसके तहत महाबली भीम ने युद्ध में अश्वत्थामा नाम के एक हाथी का वध कर दिया था. यह हाथी मालव नरेश इन्द्रवर्मा का था. यह झूठी सूचना जब युधिष्ठिर द्वारा द्रोणाचार्य को दी गई तो उन्होंने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए और समाधिष्ट होकर बैठ गए. इस अवसर का लाभ उठाकर द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने उनका सर धड़ से अलग कर दिया.
3. अश्वस्थामा द्वारा पांडवों के शिविर पर हमलाः अपनी पिता की मृत्यु का समाचार मिलने के बाद द्रोण पुत्र अश्वत्थामा व्यथित हो गया. युद्ध के दौरान अश्वत्थामा ने दुर्योधन को वचन दिया कि वह अपने पिता की मृत्यु का बदला लेकर ही रहेगा. इसके बाद उसने किसी भी तरह से पांडवों की हत्या करने की कसम खाई. युद्ध के अंतिम दिन दुर्योधन की पराजय के बाद अश्वत्थामा ने बचे हुए कौरवों की सेना के साथ मिलकर पांडवों के शिविर पर हमला किया. उस रात उसने पांडव सेना के कई योद्धाओं पर हमला किया और मौत के घाट उतार दिए. उसने अपने पिता के हत्यारे धृष्टद्युम्न और उसके भाईयों की हत्या की, साथ उसने द्रौपदी के पांचों पुत्रों की भी हत्या कर डाली.
4. ब्रह्मास्त्र चलाने के बाद गिरफ्त मेंः अपने इस कायराना हरकत के बाद अश्वत्थामा शिविर छोड़कर भाग निकला. द्रौपदी के पांचों पुत्रों की हत्या की खबर जब अर्जुन को मिली तो उन्होंने क्रुद्ध होकर रोती हुई द्रौपदी से कहा कि वह अश्वत्थामा का सर काटकर उसे अर्पित करेगा. अश्वत्थामा की तलाश में भगवान श्रीकृष्ण के साथ अर्जुन निकल पड़ें. अर्जुन को देखने के बाद अश्वत्थामा असुरक्षित महसूस करने लगा. उसने अपनी सुरक्षा के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया जो उसे द्रोणाचार्य ने दिया था. गुरुपुत्र होने पर भी उसे केवल ब्रह्मास्त्र छोड़ना आता था, वापस लेना नहीं आता था, तथापि अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया. उधर श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन को ब्रह्मास्त्र छोड़ने की सलाह दी. अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र को पांडवों के नाश के लिए छोड़ा था जबकि अर्जुन ने उसके ब्रह्मास्त्र को नष्ट करने के लिए।
5. द्रोपदी ने माफ़ किया अश्वस्थामा ने : ब्रह्मास्त्र को नष्ट करने के बाद अश्वत्थामा को रस्सी में बांधकर द्रौपदी के पास लाया गया. अश्वत्थामा को रस्सी से बंधा हुआ देख द्रौपदी का कोमल हृदय पिघल गया और उसने अर्जुन से अश्वत्थामा को बन्धनमुक्त करने के लिए कहा.
6. भारी पडा़ श्रीकृष्ण का शाप अब तकः अश्वत्थामा के इस कृत्य के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उसे शाप दिया कि ‘तू पापी लोगों का पाप ढोता हुआ तीन हज़ार वर्ष तक निर्जन स्थानों में भटकेगा. तेरे शरीर से सदैव रक्त की दुर्गंध नि:सृत होती रहेगी। तू अनेक रोगों से पीड़ित रहेगा तथा मानव और समाज भी तेरे से दूरी बनाकर रहेंगे। ऐसा कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण के शाप के बाद अश्वत्थामा आज भी अपनी मौत की तलाश में भटकता रहा लेकिन उसे मौत नसीब नहीं हुई और वे तब से मथुरा के इस क्षेत्र में ही अपने स्थल पर विद्यमान बताए जाते हैं।
7. परिक्रमा देने हर शनिवार आते हैं लोगः दूर-दूर से भक्त यहां परिक्रमा देने आते हैं भक्त। यहां मौजूद कई मंदिरों पर उनका तांता लगा रहता है, इतना ही नहीं स्थानीय लोगों के अनुसार यहां आस पास कई पुराने खण्डहर हैं, जो पता नहीं किस महानुभूति के बनाए हैं। खास बात यह है कि जंगल की लकडियां बेचने की हिमाकत कोई नहीं करता है। और विकराल जंगल में कोई भीतर भी नहीं जाता, परिक्रमा मार्ग कच्ची पगडंडियों से होकर गुजरता है। यह फोटो तो आप देख ही रहे हैं न ऐसे ही स्थान बहुत हैं पिसावा में।
8. शिवजी के मंदिर में पूजा करने आते है अश्वस्थामा: मप्र के असीरगढ़ के किले व अश्वत्थामा के बारे में आपसे स्थानीय लोगों की बात साझा करें तो यह कहा जाता है कि यहां मौजूद शिव जी के मंदिर में अश्वस्थामा पूजा करते हैं।
कहा जाता है कि असीरगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश के ही जबलपुर शहर के गौरीघाट (नर्मदा नदी) के किनारे भी अश्वत्थामा भटकते रहते हैं। स्थानीय निवासियों के अनुसार कभी-कभी वे अपने मस्तक के घाव से बहते खून को रोकने के लिए हल्दी और तेल की मांग भी करते हैं। कई लोगों ने इस बारे में अपनी आपबीती भी सुनाई।किसी ने बताया कि उनके दादा ने उन्हें कई बार वहां अश्वत्थामा को देखने का किस्सा सुनाया है। तो किसी ने कहा- जब वे मछली पकडऩे वहां के तालाब में गए थे, तो अंधेरे में उन्हें किसी ने तेजी से धक्का दिया था। शायद धक्का देने वाले को उनका वहां आना पसंद नहीं आया। गांव के कई बुजुर्गों की मानें तो जो एक बार अश्वत्थामा को देख लेता है, उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है।
शिव मंदिर में करते है पूजा-अर्चना
किले में स्थित तालाब में स्नान करके अश्वत्थामा शिव मंदिर में पूजा-अर्चना करने जाते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि वे उतावली नदी में स्नान करके पूजा के लिए यहां आते हैं। आश्चर्य कि बात यह है कि पहाड़ की चोटी पर बने किले में स्थित यह तालाब बुरहानपुर की तपती गरमी में भी कभी सूखता नहीं। तालाब के थोड़ा आगे गुप्तेश्वर महादेव का मंदिर है। मंदिर चारो तरफ से खाइयों से घिरा है। किंवदंती के अनुसार इन्हीं खाइयों में से किसी एक में गुप्त रास्ता बना हुआ है, जो खांडव वन (खंडवा जिला) से होता हुआ सीधे इस मंदिर में निकलता है।
इसी रास्ते से होते हुए अश्वत्थामा मंदिर के अंदर आते हैं। भले ही इस मंदिर में कोई रोशनी और आधुनिक व्यवस्था न हो, यहां परिंदा भी पर न मारता हो, लेकिन पूजा लगातार जारी है। शिवलिंग पर प्रतिदिन ताजा फूल एवं गुलाल चढ़ा रहता है।
जहां तक अश्वत्थामा की बात है, तो शफी साहब फरमाते हैं कि मैंने बचपन से ही इन किंवदंतियों को सुना है। मानो तो यह सच है न मानो तो झूठ।
अष्ट चिरंजीवियों में से एक हैं अश्वत्थामा
महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक अश्वत्थामा थे। ये कौरवों व पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र थे। हनुमानजी आदि आठ अमर लोगों में अश्वत्थामा का नाम भी आता है। इस विषय में एक श्लोक प्रचलित है-
अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।
अर्थात अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय- ये आठों अमर हैं।
