शिक्षक दिवस पर विशेष: भीलांचल में शिक्षा की अलख जगाने वाले 'देवता' मामा बालेश्वर दयाल
कुशलगढ़/बांसवाड़ा। शिक्षक दिवस के अवसर पर जहां पूरा देश डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का स्मरण कर रहा है, वहीं राजस्थान और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती भीलांचल अंचल में एक ऐसे महान शिक्षाविद और समाज सुधारक की गाथा गूंज रही है, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन जनजाति समाज के उत्थान, शिक्षा और स्वाभिमान के लिए समर्पित कर दिया। हम बात कर रहे हैं वनांचल क्षेत्र में 'देवता' की तरह पूजे जाने वाले पूज्य मामा बालेश्वर दयाल की।
इटावा से आकर भीलांचल को बनाया कर्मभूमि
5 सितंबर 1906 को उत्तर प्रदेश के इटावा (ग्राम नेवाड़ी) के एक संपन्न परिवार में जन्मे बालेश्वर दयाल जी की रुचि शुरू से ही समाज सेवा में थी। नियति उन्हें मध्य प्रदेश और राजस्थान के सीमावर्ती भील बहुल क्षेत्रों में ले आई। महाराणा प्रताप के वीर सहयोगियों के वंशजों के बीच उन्होंने अपना ठिकाना बनाया और उन्हीं की तरह साधारण जीवन शैली अपनाई—चना, जौ और चुन्नी के आटे की मोटी रोटी खाकर वे जीवनभर आदिवासियों के हक के लिए लड़ते रहे।
शिक्षा की अलख और 'बामनिया आश्रम' की स्थापना
1937 में मामा जी ने झाबुआ जिले में ‘बामनिया आश्रम’ की नींव रखी और बाद में थांदला में छात्रावास बनाकर जनजाति युवाओं को शिक्षा से जोड़ने का महाअभियान शुरू किया। तत्कालीन जमींदारों और रूढ़िवादी ताकतों ने उन्हें जेल भी भिजवाया, लेकिन मामा जी का संकल्प डगमगाया नहीं। उनके प्रयासों से शिक्षित हुए अनेक युवा आज उच्च सरकारी और निजी सेवाओं में कार्यरत हैं। स्थानीय शिक्षक परिवार गर्व से बताते हैं कि मामा जी की प्रेरणा से ही उनकी पीढ़ियां शिक्षित होकर आज समाज को दिशा दे रही हैं।
धर्मांतरण के खिलाफ 'उलगुलान' और सामाजिक क्रांति
अकाल के समय मुट्ठी भर राहत सामग्री की आड़ में धर्म परिवर्तन करा रही ईसाई मिशनरियों के खिलाफ मामा बालेश्वर दयाल ने बड़ा मोर्चा खोला। Nanji भाई कटारा, रादु जी, मन्ना जी और अन्य स्थानीय सहयोगियों के साथ मिलकर उन्होंने थांदला व आसपास के क्षेत्रों में धर्मांतरण पर प्रभावी रोक लगाई। पुरी के पूज्य शंकराचार्य की लिखित सहमति से उन्होंने जनजातीय बंधुओं को जनेऊ धारण कराकर उनके स्वाभिमान की रक्षा की। बामनिया में प्रसिद्ध राम मंदिर का निर्माण भी इसी संघर्ष की एक ऐतिहासिक कड़ी बना।
जन-जन की आस्था के केंद्र
26 दिसंबर 1998 को बामनिया आश्रम में ही मामा जी ने अंतिम सांस ली। आज भी झाबुआ और बांसवाड़ा अंचल के भील समाज में उन्हें गुरु और देवता का दर्जा प्राप्त है। क्षेत्र के लोग अपनी नई फसल पकने पर पहला अनाज 'नवाई' के रूप में आज भी मामा जी के आश्रम में अर्पित करते हैं।
शिक्षा, स्वाभिमान और सेवा का जो दीप मामा बालेश्वर दयाल ने जलाया था, उसकी लौ आज भी हर घर में ज्ञान का उजाला फैला रही है। शिक्षक दिवस के इस पावन अवसर पर प्राइम न्यूज़ राजस्थान ऐसे महान राष्ट्र-निर्माता और शिक्षाविद को कोटि-कोटि नमन करता है।

