श्रद्धा, भक्ति और आस्था को बढ़ावा देने में किन्नर समाज का अप्रतिम योगदान
कुशलगढ़ (बांसवाड़ा): भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में किन्नर समाज का इतिहास अत्यंत प्राचीन, गौरवशाली और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध रहा है। पौराणिक काल से लेकर आधुनिक युग तक, इस समाज ने भक्ति और आस्था की जड़ों को मजबूत करने में मूक लेकिन प्रभावशाली भूमिका निभाई है।
प्राइम न्यूज राजस्थान की विशेष कवरेज में बांसवाड़ा जिले के कुशलगढ़ स्थित गादीपति गोरी बुआ और उनकी शिष्या शालू बुआ से सीधी बातचीत हुई। उन्होंने बताया कि भले ही इतिहास के कुछ कालखंडों में इस समाज को सामाजिक उपेक्षा झेलनी पड़ी हो, लेकिन धार्मिक दृष्टिकोण से इन्हें हमेशा पूजनीय स्थान प्राप्त रहा है।
कुशलगढ़ में गोरी बुआ का भक्ति व जनजागरण अभियान
शालू बुआ ने अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि गुरु गोरी बुआ ने कुशलगढ़ में सनातन संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों के संरक्षण के लिए अपना पूरा जीवन ईश्वर भक्ति में समर्पित कर दिया है।
क्षेत्र के धार्मिक स्थलों के पुनरुद्धार और जनजागरण में गोरी बुआ का योगदान अविस्मरणीय है:
सत्यवीर तेजाजी महाराज मंदिर
माँ चमत्कारी भैरवजी मंदिर
दशा माता मंदिर
बाबा रामदेव जी का मंदिर
इन सभी प्रमुख स्थानों पर गोरी बुआ द्वारा किए गए सेवा कार्यों और भक्ति जागरण को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
पौराणिक एवं सांस्कृतिक धरोहर में किन्नर समाज की भूमिका
1. पौराणिक ग्रंथों में आध्यात्मिक स्थान
श्रीराम का ऐतिहासिक वरदान: रामायण काल में जब प्रभु श्रीराम वनवास जा रहे थे, तब तमसा नदी के तट पर उन्होंने 'नर और नारी' को वापस लौटने को कहा। १४ वर्ष बाद लौटने पर भी किन्नर समाज वहीं प्रभु की प्रतीक्षा में खड़ा मिला। उनकी इस निश्छल भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीराम ने उन्हें वरदान दिया कि उनकी दुआएं सदैव निष्फल नहीं होंगी।
महाभारत के प्रसंग: अर्जुन का 'बृहन्नला' रूप और धर्म युद्ध में 'शिखंडी' की भूमिका यह साबित करती है कि धर्म और न्याय की स्थापना में इस समाज का योगदान सदैव प्रासंगिक रहा है।
2. अनूठी भक्ति परंपराएं
कूवागम उत्सव (तमिलनाडु): भगवान अरावन (इरावन) के प्रति किन्नर समाज का समर्पण भक्ति की पराकाष्ठा है। भगवान श्रीकृष्ण के 'मोहिनी' रूप को आत्मसात कर वे इस उत्सव में हिस्सा लेते हैं।
बहुचरा माता (गुजरात): पश्चिमी भारत में किन्नर समाज बहुचरा माता को अपनी कुलदेवी मानकर निष्ठापूर्वक पूजन करता है।
3. सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने में आस्था (नेग व दुआएं) गृह प्रवेश, विवाह और बाल जन्म जैसे शुभ अवसरों पर किन्नर समाज की उपस्थिति व 'नेग' की परंपरा शुभ मानी जाती है। लोक विश्वास है कि उनके मुख से निकली निष्काम दुआएं सीधे ईश्वर तक पहुंचती हैं।
4. आधुनिक युग में आध्यात्मिक पुनरुत्थान: 'किन्नर अखाड़ा' २०१५-१६ में आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के नेतृत्व में गठित 'किन्नर अखाड़ा' ने धार्मिक जगत में क्रांतिकारी बदलाव लाया। २०१६ उज्जैन सिंहस्थ कुंभ और २०१९ प्रयागराज कुंभ में किन्नर अखाड़े की भव्य पेशवाई ने सनातन धर्म की ध्वजा को वैश्विक पटल पर लहराया।
5. सूफी व भक्ति आंदोलन में समभाव अजमेर शरीफ से लेकर हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह तक, सूफियाना कलाम और सेवा के माध्यम से यह समाज यह संदेश देता है कि भक्ति किसी लिंग की मोहताज नहीं होती—यह आत्मा का परमात्मा से सीधा मिलन है।
संवेदनशील और समावेशी समाज का संदेश
तमाम सामाजिक विषमताओं के बावजूद किन्नर समाज ने हमेशा जगत के कल्याण की कामना की है। बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की खुशियों में शरीक होना और दुआएं देना ही उनकी सबसे बड़ी साधना है।
कुशलगढ़ में गोरी बुआ द्वारा जलाया गया भक्ति का यह दीप यह सिद्ध करता है कि ईश्वर के दरबार में केवल भाव और निष्ठा का महत्व है। किन्नर समाज का यह अतुलनीय योगदान हम सभी को एक अधिक संवेदनशील, समावेशी और आध्यात्मिक समाज बनाने की प्रेरणा देता है।
