दोस्तों! आज ग़द्दार मोहब्बत आपको एक ऐसे आतंकवादी शायर से रू-ब-रू कराएगा जो देश में खुले-आम राष्ट्रद्रोही कविता पढ़ता है और उसको कोई रोकने वाला नहीं है.जी हाँ! हम बात कर रहे हैं आतंकवादी शायर "इमरान प्रतापगढ़ी" की जिसको देश के कई मुसलमान और सेक्युलर केवल इसलिए बुलाते हैं ताकि उसके मुंह से वैचारिक स्वच्छंदता के नाम पर देश के खिलाफ ज़हर उगलवाया जा सके.
पूर्व विदेशमंत्री सलमान खुर्शीद ने तो इसे पिछले पाँच वर्षों में इतना पोषित किया कि ये आतंकवादी शायर देश के हर मुशायरे का अभिन्न अंग बन गया. जहाँ आल-इंडिया मुशायरे में किसी दूसरे शायर को १०००० रुपये का भुगतान किया जाता है वहीं इस नापाक आतंकवादी को केवल मोदी को गाली देने के लिए ५०००० या उससे भी ज्यादा भुगतान होता है.
मित्रों! कविता का धर्म समाज को तोड़ना नहीं बल्कि जोड़ना होता है. प्रखर हिंदुत्व के आइकॉन कवि रहे आचार्य ब्रजेन्द्र अवस्थी जी, राष्ट्रकवि उर्मिलेश या डॉ. राहुल अवस्थी ही को ले लीजिये, इन लोगों ने कभी भी मंच से समाज के एक वर्ग को दूसरे वर्ग से सदा मोहब्बत से पेश आने की ही सीख दी है जबकि ये आतंकवादी शायर केवल समाज को तोड़ने के लिए ही पोषित किया जा रहा है.
चूंकि कविता किसी भी राष्ट्र की संस्कृति को गति देने का एक जीवंत माध्यम होती है अतः कविता से ग़द्दारी करने वाला भी देश का ग़द्दार ही कहा जायेगा. आईये आपको दिखाते हैं इसकी जेहादी सोच का एक नमूना इस कविता में जिसके अन्दर ये बग़ावत का पैग़ाम देते हुए देश को वियतनाम बनाने की धमकी दे रहा है. इसकी धृष्टता का आलम ये है कि ये आतंकवादी शायर ये कविता खुलेआम उन मजलिसों में भी पढता है जहाँ ८०% से अधिक श्रोता हिन्दू होते हैं और मज़े की बात तो देखिये वो ही इसकी कविता पर जमकर तालियाँ बजाते हैं.
ग़द्दार मोहब्बत वो शख्स है जो अपनी जान से तो ग़द्दारी कर सकता है मगर अपने देश से कदापि नहीं मगर वो ये देख कर आश्चर्यचकित है कि उसके देश में ऐसे भी लोग बसते हैं जो ऐसे ग़द्दारों को ख़त्म करने की तो छोड़िये, इनको फलने-फूलने का हर अवसर तक उपलब्ध करवाने में जुटे रहते हैं.
आइये देखते है इस आतंकवादी शायर की ये कविता जो ओवैसी की शैली में भारत को खुलेआम धमकाते हुए वियतनाम बनाने की चेतावनी दे रही है-
"मैं कश्मीर हूँ...."____________
न बुज़ुर्गों के ख़्वाबों की ताबीर हूँ
न मैं जन्नत की अब कोई तस्वीर हूँ!
जिसको मिल करके सदियों से लूटा गया,
मैं वो उजड़ी हुई एक जागीर हूँ!!
हां मैं कश्मीर हूँ, हां मैं कश्मीर हूँ.
मेरे बच्चे बिलखते रहे भूख से,
ये हुई है सियासत की इक चूक से !
रोटियां मांगने पर मिलीं गोलियां,
चुप कराया गया उनको बंदूक से !
न कहानी हूँ न कोई किस्सा हूँ मैं
मेरे भारत तेरा एक हिस्सा हूँ मैं !!
जिसको गाया नही जा सका आज तक
ऐसी इक टीस हूँ ऐसी इक पीर हूँ………!
हां मैं कश्मीर हूँ हां मैं कश्मीर हूँ.
यूं मेरे हौसले आज़माए गए,
मेरी सांसों पे पहरे बिठाए गए !
पूरे भारत में कुछ भी कहीं भी हुआ,
मेरे मासूम बच्चे उठाए गए !!
यूं उजड़ मेरे सारे घरौंदे गए,
मेरे जज़्बात बूटों से रौंदे गए !
जिसका हर लफ़्ज आंसू से लिक्खा गया,
ख़ूं में डूबी हुई ऐसी तहरीर हूँ….!
हां मैं कश्मीर हूँ, हां मैं कश्मीर हूँ.
मैं बग़ावत का पैग़ाम बन जाऊंगा,
मैं सुबह हूं मगर शाम बन जाऊंगा !
गर सम्भाला गया न मुझे प्यार से,
एक दिन मैं वियतनाम बन जाऊंगा !!
मुझको इक पल सुकूं है न आराम है,
मेरे सर पर बग़ावत का इल्ज़ाम है !!
जो उठाई न जाएगी हर हाथ से
ऐ सियासत मैं इक ऐसी शमशीर हूँ…..!
हां मैं कश्मीर हूँ, हां मैं कश्मीर हूँ.
(इमरान प्रताप गढ़ी)
(Madan Mohan Tiwari)
