
भारत में आजकल जन्म ब्राह्मण तो बहुत मिल जायेंगे पर कर्म, प्रवृती, स्थितिप्रग्य ब्राह्मण कम ही बचे है, आएये जाने ब्राहमण शब्द का "अर्थ", "परिभाषा", एवम "प्रकार"....,
"परिभाषा एवम अर्थ" - यस्क मुनि की निरुक्त के अनुसार - "ब्रह्म जानाति ब्राह्मण:"
ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म (अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है।
अतः ब्राह्मण का अर्थ - "ईश्वर का ज्ञाता" होना है।
"प्रकार" - ब्राह्मण आठ प्रकार के कहे गये हैं! और यह भी जाने की कितने प्रकार के ब्राह्मण लुप्त हो चुके हैं और कितने प्रकार के शेष गये हैं!
१-मात्र, २-ब्राह्मण, ३-श्रोत्रिय, ४-अनूचान, ५- भ्रूण, ६- ऋषिकल्प, ७-ऋषि और ८-मुनि!
इन के लक्षण इस प्रकार हैं!
१-मात्र :- जो ब्राह्मणों के कुल में उत्पन्न हुआ हो, किन्तु उनके गुणों से युक्त न हो, आचार और क्रिया से रहित हो, वह "मात्र" कहलाता है!
२-ब्राह्मण :-जो वेदों में पारंगत हो, आचारवान हो, सरल-स्वभाव, शांतप्रकृति, एकांतसेवी, सत्यभाषी और दयालु हो वह " वह "ब्राह्मण" कहा जाता है!
३-श्रोत्रिय : -जो वेदों की एक शाखा छ: अंगों और श्रौत विधियों के सहित अध्ययन करके अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन, दान और प्रतिग्रह ---इन छ: कर्मों में रत रहता हो, उस धर्मविद ब्रह्मण को "श्रोत्रिय" कहते हैं!
४-अनूचान :- जो ब्राह्मण वेदों और वेदांगों के तत्त्व को जाननेवाला, शुद्धात्मा, पाप रहित, शोत्रिय के गुणों से संपन्न, श्रेष्ठ और प्राज्ञ हो, उसे "अनूचान" कहा गया है!
५- भ्रूण :- जो अनूचान के गुणों से युक्त हो, नियमित रूप से यज्ञ और स्वाध्याय करने वाला, यज्ञ शेष का ही भोग करने वाला और जितेन्द्रिय हो उसे शिष्टजनों ने "भ्रूण" की संज्ञा दी है!
६- ऋषिकल्प :- जो समस्त वैदिक और लौकिक ज्ञान प्राप्त करके आश्रम व्यवस्था का पालन करे, नित्य आत्मवशी रहे, उसे ज्ञानीजन "ऋषिकल्प" नामसे स्मरण किया है!
७-ऋषि :-जो ब्राह्मण ऊर्ध्वरेता, अग्रासन का अधिकारी, नियत आहार करनेवाला, संशय रहित, शहप देने और अनुग्रह करने में समर्थ और सत्य-प्रतिज्ञा हो, उसे "ऋषि" की पदवी दी गयी है!
८-मुनि :-जो कर्मों से निवृत्त, सम्पूर्ण तत्त्व का ज्ञाता, काम-क्रोध से रहित, ध्यानस्थ, निष्क्रिय और शांत हो, मिटटी और सोने में समभाव रखता हो, उसे "मुनि" के नाम से सम्मानित किया है!
इस प्रकार से ब्राह्मण आठ प्रकार के हैं ।
ऋषि और मुनि वर्तमान में पाये नही जाते... सत्य तो यह है कि वर्तमान में लोगों को ऋषि और मुनि की संकल्पना का ही वास्तविक ज्ञान नही होता ...कलियुग में कई लोग अपने मनानुसार उपर्युक्त प्रकारों का दुरुपयोग करते है, स्वार्थवश स्वयं ही अपने आप को पदवी देते है, कोई स्वयं को "ऋषि" कहता है, कोई "मुनि" तो कोई लोकेशना एवम अहंकार को पुष्ट करने के लिये "संत/ महात्मा" बन समाज को भ्रमित करता है,
गुरुकूल पध्यति शिक्षा के नष्ट होने के कारण अधिकांश लोगो में "हिन्दू-धर्म" की धार्मिक शिक्षा का ज्ञान नही है, अतेव भारतीय संस्कृति अनुसार व्याख्यायित शब्द के मूल अर्थो से अधिकांश जनता पूर्णरुप से अनिभिज्ञ है, जिसका लाभ कुछ धूर्त, शठ, दुराचारी उठा रहे है |
