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शरीर से हिन्दुस्तानी परंतु दिमाग से अंग्रेज


    हमारी संस्कृति का दम घुट रहा है और हमें पता ही नहीं कि हमारे बोलने से, खाने पीने से, उठने बैठने से और परस्पर व्यवहार से आज अंग्रजीयत की बू आती है। पाश्चात्य शिक्षा पद्धति ने हमको हमारी भारतीय संस्कृति से कोसों दूर लाकर खड़ा कर दिया है। अंग्रेजों के द्वारा लायी गयी इस शिक्षा पद्धति के पीछे हमारा कितना बड़ा पतन छिपा है इसको हमने जानने की कभी कोशिश ही नहीं की।
    अंग्रेजों का 1858 में 'इंडियन एजुकेशन एक्ट' बनाने के पीछे लार्ड मैकाले की कितनी घिनौनी योजना थी, उससे हम अपरिचित तो नहीं हैं, फिर भी हमने कभी इस ओर ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझी। लार्ड मैकाले कहा करता थाः 'यदि इस देश को हमेशा के लिए गुलाम बनाना चाहते हो तो हिन्दुस्तान की स्वदेशी शिक्षा पद्धति को समाप्त कर उसके स्थान पर अंग्रजी शिक्षा पद्धति लाओ। फिर इस देश में शरीर से तो हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे। जब वे लोग इस देश के विश्वविद्यालय से निकलकर शासन करेंगे तो वह शासन हमारे हित में होगा।' यह थी लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति। परंतु हम समझते हैं कि इसी पद्धति से हम आगे बढ़े हैं लेकिन वास्तव में आगे बढ़ने का दिखावा मात्र करते हुए आज हम इतने पीछे चले गये कि हम कहाँ से चले थे वह स्थान ही भूल गये।
     मैकाले का वह घिनौना षडयंत्र आज हम सबके सामने अपनी जड़ें फैला रहा है और हम उसे खाद पानी देते जा रहे हैं। आज विद्यालयों में फैल रही अनैतिकता, अपराधीकरण तथा विद्यार्थियों के मानसिक असंतुलन का कारण यही लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति है जिसने हिन्दुस्तान को काले अंग्रेजों का देश बनाने में लगभग सफलता हासिल कर ली है। आज के हिन्दुस्तान को काले अंग्रेजों का देश बनाने में लगभग सफलता हासिल कर ली है। आज के हिन्दुस्तान को कोई देखे तो यह अनुमान नहीं लगा सकता कि इस देश में कभी श्रीकृष्ण, श्रीराम व युधिष्ठिर जैसे महान राजाओं को जन्म देने वाली गुरूकुल शिक्षा पद्धति रही होगी।
    इस गंभीर स्थिति में हमें चाहिए कि हम अपनी मधुर व हितभरी स्वदेशी भाषा का इस्तेमाल करें। अपने गुरूओं के द्वारा चलायी गयी गुरूकुल पद्धति द्वारा भारतीय संस्कृति के उच्च संस्कारों से विद्यार्थी के जीवन को सिंचित कर उसे महान एवं तेजस्वी नागरिक बनायें। उसे गुलाम नहीं वरन् स्वतंत्र देश का सम्मानीय स्वतंत्र पुरूष बनायें जिससे हम अपने देश के खोये गौरव को पुनः प्राप्त कर सकें। हम अपने बच्चों को अपनी राष्ट्रभाषा, मातृभाषा का प्रयोग सिखाएँ। उन्हें पाश्चात्य संस्कृति के मोहजाल में फँसने से बचाएँ। उन्हें कान्वेंट स्कूलों में न पढ़कर भारतीय पद्धति के अनुसार गुरूओं की पद्धति द्वारा संयम और सदाचार का जीवन जीना सिखाएँ ताकि उनके द्वारा भी हमें हजारों रत्न प्राप्त हो सकें व अपनी मातृभूमि के गौरव को चार चाँद लगा सकें।