Breaking News
Loading...

राष्ट्रीय चैंपियन की बेबसी दूसरों के घरों के बर्तन धो कर मिलता है बचा हुआ खाना

   कैथल।। इसे विडंबना कहें या कुछ और मगर यह सच है कि दूध-दही खाने वाले और खेल को बढ़ावा देने वाले प्रदेश हरियाणा में एक राष्ट्रीय खिलाड़ी ऐसी भी है जो खुराक में दूसरों के घरों का बचा खाना खाने को मजबूर है।यह खिलाड़ी है ककहेड़ी प्लाट गांव की 14 वर्षीय बेबी रानी जिसने इसी वर्ष जनवरी में तेलंगाना में सब जूनियर हैंडबॉल स्पर्धा में अंडर-15 श्रेणी में स्वर्ण जीता है। वह अक्टूबर 2014 में सब जूनियर स्टेट और फरवरी 2015 में स्कूल स्टेट प्रतिस्पर्धा में भी सिल्वर मेडल जीत चुकी है।बेबी की आर्थिक हालात इतनी खराब है कि उसे गुजारा करने के लिए दूसरों के घरों का गोबर उठाना और झूठे बर्तन मांजना पड़ते हैं।इसके बदले उसे पैसे नहीं बल्कि खाना मिलता है और यही इस खिलाड़ी की खुराक है। रानी के पिता की मौत उसके जन्म से कुछ पहले हो गई थी। मां दूसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा करती है।कहीं से कुछ पैसा मिल जाता है तो कहीं से अनाज। 1200 रुपये प्रतिमाह विधवा पेंशन भी मिलती है। बूढ़े दादा-दादी साथ रहते हैं। उन्हें भी 1200-1200 रुपये महीना वृद्धावस्था पेंशन मिलती है मगर 3600 रुपए में घर नहीं चलता। इसलिए बेबी और उसकी बड़ी बहन शीतल (16 साल) जो खुद हैंडबॉल में राज्य स्तर पर मेडल जीत चुकी है काम में मां का हाथ बंटाती हैं। हालांकि एससी/बीपीएल की श्रेणी में होने के कारण बेबी को खेल विभाग की ओर से अपेक्षाकृत ज्यादा धनराशि मिलने का प्रावधान है।लेकिन विंग में शामिल होने के बाद यह राशि वर्ष भर बाद आती है।मतलब बेबी ने स्टेट व नेशनल लेवल पर जो मेडल जीते है उसके लिए उसे जो सरकारी धनराशि मिलनी है वह अगले साल आएगी। कांगथली के राजकीय विद्यालय में 10वीं कक्षा की छात्रा बेबी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड जीतना चाहती है। शरीर को मजबूत बनाने के लिए खुराक के बारे में पूछने पर वह बताती है रोटी सब्जी मिलती है बस।कई बार दूसरों के घर से जो खाना मिलता है उसी से काम चलाना पड़ता है।