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न्यूक्लियर्स सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) में भारत को सदस्यता मिलने पर रोक

     एनएसजी (परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह) में शामिल होने की भारत की सारी मेहनत नाकाम हो गई हैं। चीन के विरोध के कारण भारत की सदस्यता के लिए की जा रही दावेदारी का अभियान खत्म हो गया हैं। 48 देशों वाले इस समूह की अहम बैठक में चीन ने भारत की दावेदारी का विरोध करते हुए कहा कि भारत ने NPT पर हस्ताक्षर नहीं कियें है, इसलिए भारत को एनएसजी में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। भारत के खिलाफ चीन की इस दलील को करीब 10 अन्य देशों का भी समर्थन दिया हैं। हालांकि भारत को अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस समेत कई देशों का समर्थन मिला था लेकिन सर्व सहमति द्वारा सदस्य बनाएं जाने पर भारत सदस्य नहीं बन सका। गौरतलब रहे कि ताशकंद में पीएम नरेंद्र मोदी ने भी चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग से विशेष मुलाक़ात कर समर्थन मांगा था।
    भारत ने पिछले छह महीनों में तेज़ी दिखाई ज़रूर लेकिन फिर भी तैयारियों में कमी रही है। सोल में हुए एनएसजी के विशेष सत्र में ब्राज़ील और स्विटज़रलैंड जैसे कई अन्य देशों ने भी भारत को मदद नहीं दी जो 2008 में भारत के समर्थन में थे।नाभिकीय आपूर्तिकर्ता समूह: नाभिकीय आपूर्तिकर्ता समूह (Nuclear Suppliers Group (NSG)) 48 देशों का एक समूह है जो नाभिकीय निरस्त्रीकरण (nuclear disarmament) के लिये प्रयासरत है। इस कार्य के लिये यह समूह नाभिकीय शस्त्र बनाने योग्य सामग्री के निर्यात एवं पुनः हस्तान्तरण को नियन्त्रित करता है। इसका वास्तविक लक्ष्य यह है कि जिन देशों के पास नाभिकीय क्षमता नहीं है वे इसे अर्जित न कर सकें।महर्त्वपूण तथ्य:एनएसजी 48 देशों का एक समूह है जो सदस्य देशों के साथ असैन्य कार्यों के लिये परमाणु सामग्री, परमाणु तकनीक के इस्तेमाल सुनिश्चित करता है। एनएसजी का गठन वर्ष 1974 में भारत के परमाणु परीक्षण की प्रतिक्रिया स्वरूप किया गया था। 
    यह समूह सैद्धांतिक रूप से केवल परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर करने वाले देशों के साथ परमाणु व्यापार की अनुमति देता है। लेकिन इस बार इस समूह ने भारत को विशेष छूट देकर ऐतिहासिक फैसला किया है। एनएसजी का कोई स्थाई कार्यालय नहीं है। एनएसजी आमतौर पर र्वाषिक बैठक करता है। सभी मामलों में फैसला सर्वसम्मित के आधार पर होता है। आरम्भ में इसके केवल सात सदस्य थे - कनाडा, पश्चिमी जर्मनी, फ्रान्स, जापान, सोवियत संघ, युनाइटेड किंगडम एवं संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए)। सन 1976 -77 में इसमें और देश शामिल कर लिये गये और इसकी सदस्य संख्या 15 हो गयी। 1990 तक 12 और देश इसमें सम्मिलित हो गये। चीन इसमें सन 2004 में शामिल हुआ।परमाणु अप्रसार संधि:परमाणु अप्रसार संधि को एनपीटी के नाम से जाना जाता है। इसका उद्देश्य विश्व भर में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के साथ-साथ परमाणु परीक्षण पर अंकुश लगाना है। 1 जुलाई 1968 से इस समझौते पर हस्ताक्षर होना शुरू हुआ।अभी इस संधि पह हस्ताक्षर कर चुके देशों की संख्या 190 है। जिसमें पांच के पास आण्विक हथियार हैं। ये देश हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, फांस, रूस और चीन। सिर्फ चार संप्रभुता संपन्न देश इसके सदस्य नहीं हैं। 
   ये हैं- भारत, इजरायल, पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया। एनपीटी के तहत भारत को परमाणु संपन्न देश की मान्यता नहीं दी गई है। जो इसके दोहरे मापदंड को प्रदर्शित करती है।इस संधि का प्रस्ताव आयरलैंड ने रखा था और सबसे पहले हस्ताक्षर करने वाला राष्ट्र है फिनलैंड। इस संधि के तहत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र उसे ही माना गया है जिसने 1 जनवरी 1967 से पहले परमाणु हथियारों का निर्माण और परीक्षण कर लिया हो। इस आधार पर ही भारत को यह दर्जा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं प्राप्त है। क्योंकि भारत ने पहला परमाणु परीक्षण 1974 में किया था। उत्तरी कोरिया ने इस सन्धि पर हस्ताक्षर किये, इसका उलंघन किया और फिर इससे बाहर आ गया।