मरने से पहले बेटी ने पापा को लिखा खत, ‘मैं अच्छी बेटी नहीं बन पाई’
नई दिल्ली।। महज 17 साल की उम्र में उस मासूम पर उम्मीदों का इतना बोझ पड़ा कि वो मर गई। दरअसल, उसकी जिंदगी का एक मात्र मकसद तय किया गया था पढ़ लिखकर डॉक्टर बनना। लेकिन वो क्या करती साइंस उस मासूम के पल्ले ही नहीं पड़ती थी। वो बेचारी रात दिन पढ़ाई करती थी भगवान के आगे गिड़गिड़ाती थी। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी ना तो मेहनत काम आई और ना ही भगवान ने साथ दिया। वो तो हार गई लेकिन चंद लफ्जों में अपने दिल का दर्द कुछ इस तरह बयान कर गई। कि शायद उन्हें पढ़कर कई लड़कियां मां-बाप की उम्मीदों की चक्की में पिसने से बच जाएं।
उस मासूम की आंखों में दुनिया देखने की आरजू थी जीने की तमन्ना थी, लेकिन नाकामियों ने इसे मौत के घाट उतार दिया। महज 17 साल की उम्र में नाकामियों का ऐसा क्या डर की जीने की तमन्ना ही खत्म हो गई। इस सवाल का जवाब जानने के लिए इसकी मानसिक हालत को समझना होगा। पढ़ें वो खत जो इसने भगवान को लिखा था।
भगवान आपसे विनती है प्लीज इस बार पास करा देना। मुझे पापा की अच्छी बेटी बनना है। प्लीज भगवान मेरी मदद करना। हेल्प मी प्लीज। भगवान आप से जिंदगी में इसके बाद कुछ और नहीं मांगूगी। प्लीज!
उसका ये खत रिजल्ट आने से एक दिन पहले का है। जिसमें वो भगवान के सामने गिड़गिड़ा रही थी, भीख मांग रही थी कि प्लीज पास करा दो। वो पूरे परिवार के साथ रहती थी लेकिन किस कदर तन्हा थी। इस चिट्ठी के ये शब्द उसके अकेले पन के गवाह हैं। घर में सबके साथ रहती थी लेकिन दिल हर वक्त भगवान के सामने गिड़गिड़ाता था।
जाहिर है वो अच्छी बेटी थी बाप की उम्मीदों पर खरा उतरना चाहती थी। इसलिए तो उसने इस चिट्ठी में भी लिखा था कि मुझे पापा की अच्छी बेटी बनना है। लेकिन वो क्या करती भगवान ने उसे वो दिमाग ही नहीं दिया था जो साइंस की केमिस्ट्री को समझ सके। रिजल्ट आया तो नतीजा फिर वही था। वो एक बार फिर फेल हो गई।
इसके बाद उसने तय कर लिया कि अपना हारा हुआ चेहरा लेकर अपने बाप के सामने नहीं जाएगी। लिहाजा उसने एक आखिरी चिट्ठी लिखी और मौत को गले लगा लिया। उसकी चिट्ठी के आखिरी लफ्जों को पढ़कर अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि वो मासूम कितने प्रेशर में थी।
I can't leave without knowing the destination। डोन्ट ब्लेम एनीवन, मैं अच्छी बेटी नहीं बन पाई। अगर मैं पास होती तो जिंदा रहती। मेरी आखि री इच्छा है कि मेरे जाने के बाद मेरे शरीर के अंग दान कर दिए जाएं। पापा आप गुस्सा कम करना। बहन तुम ठीक से पढ़ना। भाई तू ठीक से पढ़ाई करना। भविष्य की डॉक्टर रीमा सूद।
उसकी आखिरी चिट्ठी में भी बार-बार पापा का जिक्र है। वो मौत को इस लिए गले लगा रही थी क्योंकि वो अच्छी बेटी नहीं बन पाई थी। उसे अपने पापा के गुस्से का बहुत डर था। वो जानती थी कि उसके पापा उसके फेल होने की खबर सुनकर गुस्सा करेंगे। इससे ज्यादा मासूमियत और क्या होगी कि पापा के गुस्से से बचने के लिए मौत को ही गले लगा लिया।
लेकिन अफसोस है उस बाप पर जो अपनी मासूम बेटी का दर्द नहीं समझ सका। अफसोस है उस पिता पर जो अपनी बेटी की कमजोरी को नहीं पहचान सका। ऐसा नहीं है कि वो मासूम पढ़ना नहीं चाहती थी। उसे तो पढ़ाई इतनी पसंद थी कि वो अपने दिल की ख्वाहिशें भी किताबों में ही उकेरती थी। रीमा ने अपनी नोट बुक में पेंसिल से उकेरी है। पेंटिंग में उकेरी गई ये दो आंखें उसके दिल का हाल बयान करने के लिए काफी हैं।
बता दें कि रीमा का परिवार मौरिस नगर के पास रिट्ज लाइन इलाके में रहता है। रीमा 11 वीं क्लास की स्टूडेंट थी, और दिल्ली के शक्ति नगर कन्या विद्यालय में पढ़ती थी। मंगलवार को उसका कंपार्टमेंट का रिजल्ट आया था। वो केमिस्ट्री के पेपर में फेल हो गई थी। रिजल्ट लेकर घर आई और चुपचाप घर के बाथरूम में जाकर खुदकुशी कर ली। वो मरी जरूर लेकिन ये भी बता गई कि वो जिंदा रहना चाहती है।
यही वजह है उसने अपने अंग दान करने की इच्छा जताई थी। बेटी की आखिरी ख्वाहिश पूरी करने के लिए घरवालों ने उसकी आंखें एक आई केअर को सौंप दी हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि रीमा की ये आंखे जल्दी ही किसी की जिंदगी को रोशनी से भर देंगी। बेटी के जाने के गम में मां का रो रो कर बुरा हाल है तो भाई बहन भी गुमसुम हैं।
अगर आप भी बच्चों पर अपनी उम्मीदों का बोझ डालते हैं तो इस बच्ची की मौत को जरूर याद कर लीजिए। क्योंकि भारी बस्तों का बोझ बच्चों को कई बार इतना कमजोर कर देता है कि वो जीने की इच्छा ही छोड़ देते हैं
नई दिल्ली।। महज 17 साल की उम्र में उस मासूम पर उम्मीदों का इतना बोझ पड़ा कि वो मर गई। दरअसल, उसकी जिंदगी का एक मात्र मकसद तय किया गया था पढ़ लिखकर डॉक्टर बनना। लेकिन वो क्या करती साइंस उस मासूम के पल्ले ही नहीं पड़ती थी। वो बेचारी रात दिन पढ़ाई करती थी भगवान के आगे गिड़गिड़ाती थी। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी ना तो मेहनत काम आई और ना ही भगवान ने साथ दिया। वो तो हार गई लेकिन चंद लफ्जों में अपने दिल का दर्द कुछ इस तरह बयान कर गई। कि शायद उन्हें पढ़कर कई लड़कियां मां-बाप की उम्मीदों की चक्की में पिसने से बच जाएं।
उस मासूम की आंखों में दुनिया देखने की आरजू थी जीने की तमन्ना थी, लेकिन नाकामियों ने इसे मौत के घाट उतार दिया। महज 17 साल की उम्र में नाकामियों का ऐसा क्या डर की जीने की तमन्ना ही खत्म हो गई। इस सवाल का जवाब जानने के लिए इसकी मानसिक हालत को समझना होगा। पढ़ें वो खत जो इसने भगवान को लिखा था।
भगवान आपसे विनती है प्लीज इस बार पास करा देना। मुझे पापा की अच्छी बेटी बनना है। प्लीज भगवान मेरी मदद करना। हेल्प मी प्लीज। भगवान आप से जिंदगी में इसके बाद कुछ और नहीं मांगूगी। प्लीज!
उसका ये खत रिजल्ट आने से एक दिन पहले का है। जिसमें वो भगवान के सामने गिड़गिड़ा रही थी, भीख मांग रही थी कि प्लीज पास करा दो। वो पूरे परिवार के साथ रहती थी लेकिन किस कदर तन्हा थी। इस चिट्ठी के ये शब्द उसके अकेले पन के गवाह हैं। घर में सबके साथ रहती थी लेकिन दिल हर वक्त भगवान के सामने गिड़गिड़ाता था।
जाहिर है वो अच्छी बेटी थी बाप की उम्मीदों पर खरा उतरना चाहती थी। इसलिए तो उसने इस चिट्ठी में भी लिखा था कि मुझे पापा की अच्छी बेटी बनना है। लेकिन वो क्या करती भगवान ने उसे वो दिमाग ही नहीं दिया था जो साइंस की केमिस्ट्री को समझ सके। रिजल्ट आया तो नतीजा फिर वही था। वो एक बार फिर फेल हो गई।
इसके बाद उसने तय कर लिया कि अपना हारा हुआ चेहरा लेकर अपने बाप के सामने नहीं जाएगी। लिहाजा उसने एक आखिरी चिट्ठी लिखी और मौत को गले लगा लिया। उसकी चिट्ठी के आखिरी लफ्जों को पढ़कर अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि वो मासूम कितने प्रेशर में थी।
I can't leave without knowing the destination। डोन्ट ब्लेम एनीवन, मैं अच्छी बेटी नहीं बन पाई। अगर मैं पास होती तो जिंदा रहती। मेरी आखि री इच्छा है कि मेरे जाने के बाद मेरे शरीर के अंग दान कर दिए जाएं। पापा आप गुस्सा कम करना। बहन तुम ठीक से पढ़ना। भाई तू ठीक से पढ़ाई करना। भविष्य की डॉक्टर रीमा सूद।
उसकी आखिरी चिट्ठी में भी बार-बार पापा का जिक्र है। वो मौत को इस लिए गले लगा रही थी क्योंकि वो अच्छी बेटी नहीं बन पाई थी। उसे अपने पापा के गुस्से का बहुत डर था। वो जानती थी कि उसके पापा उसके फेल होने की खबर सुनकर गुस्सा करेंगे। इससे ज्यादा मासूमियत और क्या होगी कि पापा के गुस्से से बचने के लिए मौत को ही गले लगा लिया।
लेकिन अफसोस है उस बाप पर जो अपनी मासूम बेटी का दर्द नहीं समझ सका। अफसोस है उस पिता पर जो अपनी बेटी की कमजोरी को नहीं पहचान सका। ऐसा नहीं है कि वो मासूम पढ़ना नहीं चाहती थी। उसे तो पढ़ाई इतनी पसंद थी कि वो अपने दिल की ख्वाहिशें भी किताबों में ही उकेरती थी। रीमा ने अपनी नोट बुक में पेंसिल से उकेरी है। पेंटिंग में उकेरी गई ये दो आंखें उसके दिल का हाल बयान करने के लिए काफी हैं।
बता दें कि रीमा का परिवार मौरिस नगर के पास रिट्ज लाइन इलाके में रहता है। रीमा 11 वीं क्लास की स्टूडेंट थी, और दिल्ली के शक्ति नगर कन्या विद्यालय में पढ़ती थी। मंगलवार को उसका कंपार्टमेंट का रिजल्ट आया था। वो केमिस्ट्री के पेपर में फेल हो गई थी। रिजल्ट लेकर घर आई और चुपचाप घर के बाथरूम में जाकर खुदकुशी कर ली। वो मरी जरूर लेकिन ये भी बता गई कि वो जिंदा रहना चाहती है।
यही वजह है उसने अपने अंग दान करने की इच्छा जताई थी। बेटी की आखिरी ख्वाहिश पूरी करने के लिए घरवालों ने उसकी आंखें एक आई केअर को सौंप दी हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि रीमा की ये आंखे जल्दी ही किसी की जिंदगी को रोशनी से भर देंगी। बेटी के जाने के गम में मां का रो रो कर बुरा हाल है तो भाई बहन भी गुमसुम हैं।
अगर आप भी बच्चों पर अपनी उम्मीदों का बोझ डालते हैं तो इस बच्ची की मौत को जरूर याद कर लीजिए। क्योंकि भारी बस्तों का बोझ बच्चों को कई बार इतना कमजोर कर देता है कि वो जीने की इच्छा ही छोड़ देते हैं
