कश्मीर
में तनाव की स्थिति कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब चिंता की एक नई वजह
इसमें जुड़ गई है। दरअसल, अब सुरक्षाबलों को छापों में कथित रूप से
आतंकवादियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चीज़ों- पेट्रोल बम,
भारत-विरोधी प्रचार सामग्री, अनधिकृत सेलफोन तथा जैश-ए-मोहम्मद व
लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों से जुड़े दस्तावेज़ - के अलावा चीन के
झंडे भी बरामद हुए हैं। पाकिस्तानी झंडो के बाद अब चीन के झंडे किसी नयी खुराफात का संकेत माने जा सकते हैं। जिस प्रकार से ब्रिक्स सम्मलेन के बाद आतंक के मुद्दे पर भारत की आतंकवाद से जंग पर चीन ने ठेंगा दिखाया हैं उससे भी इस नयी खुराफात में कश्मीर की आग भड़काने के खेल के नए खिलाड़ी के सामने आने के संकेत हैं। सरकार की विदेश नीति भी सवालो के घेरे में हैं। करीब 70 वर्ष के हो चुके भारतीय लोकतंत्र में अब कमोबेश सबकुछ चुनावों के मद्देनजर ही किया जाने लगा है। यदि यह नहीं होता तो शायद पिछले दिनों से लगातार गूंज रहे सर्जिकल स्ट्राइक को यूपी के चुनावी मैदान में उतारने की योजना पर भाजपा काम नहीं करती।
कहा जा रहा है कि चाहे वह मामला आंतरिक हो या बाह्य, हर सफल मुद्दे को भाजपा के नेता चुनावी लाभ लेने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसी के अंतर्गत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के संगठन ब्रिक्स सम्मेलन को भी यूपी चुनाव के मैदान में उतारने की योजना थी।
दरअसल, जानकार बताते हैं कि यदि ब्रिक्स सम्मेलन पूर्णतया भारत के हित में होता और भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चीन के पाकिस्तान के विरुद्ध और भारत के पक्ष में समझा लिए होते तो शायद सर्जिकल स्ट्राइक के साथ-साथ ब्रिक्स भी भाजपा के होर्डिंग्स और बैनर पर दिखने लगता। लेकिन अब ब्रिक्स मुद्दे पर भाजपा खेमे में गजब का सन्नाटा देखा जा रहा है। पर इस नयी खुराफात पर यह सन्नाटा भारी पड सकता हैं सो सत्ताधारी भाजपा को चुनावी मोड से बाहर आकर केंद्रीय व राजकीय स्तर पर चीन का भी उसी प्रकार विरोध जताना होगा जिस प्रकार वह पाकिस्तान का जता रहे हैं। अब समय हैं कि पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) के साथ साथ चीन अधिकृत कश्मीर (सीओके) के हिस्सो को भी वापिस लेने पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाया जाए।
