... और जिनको जान प्यारी थी वो मुसलमान हो गए'

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Image result for guru gobind singh”चिड़ियों से मै बाज लडाऊ गीदड़ों को मैं शेर बनाऊ. सवा लाख से एक लडाऊ तभी गोबिंद सिंह नाम कहाउं,”
      ये बातें कही गई थी गुरू गोविंद सिंह द्वारा और ये बातें सच कर दिखाई थी उन्होंने चमकौर के युद्ध में, जहां महज 40 सिख सैनिक, 10 लाख मुगल सैनिकों पर भारी पड़े थे। मुगल सैनिकों ने आनंदपुर साहिब को करीब 6 महीने तक घेरे रखा ये सोचकर कि राशन पानी खत्म होने के बाद गोविंद सिंह आत्मसमपर्ण कर देंगे, पर सिंह की बाजुएं तो गुलामी से ज्यादा लड़ाई के लिए फड़क रही थी।
       गुरू गोविंद सिंह अपने सभी साथियों को लेकर वहां से सिरसा नदी की ओर निकल पड़े। सिरसा नदी में पानी उफान पर था लेकिन इससे भी ज्यादा ताकतवर थी सिंहों का हौसला। सिरसा नदी पार करते हुए कई सिखों की जान चली गई। इधर जैसे हीं मुगलों को इस बात का भनक लगा तो वो तुरंत ही सिरसा नदी पर आ धमके। चूंकि पीछे शत्रु था इसलिए ये फैसला किया गया कि कुछ सैनिक शत्रुओं को उलझा कर रखे ताकि बांकि सैनिकों के साथ सिरसा नदी पार कर सकें। इसके बाद उदय सिंह और जीवन सिंह अपने मुट्ठी भर सैनिकों के साथ मुगलों से भीड़ गए। वो दोनों तब तक लड़ते रहे जह तक की उनका आखिरी सैनिक जीवित था। दोनों लड़ते-लड़ते अपने सौनिकों के साथ वीरगति को प्राप्त हो गए। सर्द ऋतु , पानी का वेग और उपर से उन चंद सिख सैनिकों के पराक्रम की वजह से शत्रु ने सिरसा पार करने की हिम्मत नहीं दिखाई।
     इधर गुरू गोविंद सिंह अपने सैनिकों के साथ नदी पार करने में कामयाब रहे। नदी के उफान पर होने की वजह से नदी पार करने के बाद सिर्फ 40 सिख सैनिक बचे। अपनी दो पुत्रों के साथ उन्होंने यहां चमकौर में एक टीले पर बनी एक कच्ची हवेली पर विश्राम करने का फैसला किया।
     यहां आकर गोविंद सिंह ने अपने 40 सैनिकों को पांच पांच की टुकड़ी में बांटा और बचे खुचे हथियार भी उनमें बांट दिया। गोविंद सिंह ने इस किले के अट्टालिका पर मोर्चा संभाला। एक बार नदी में पानी कम हुआ तो उन्होंने गुरूजी के पास संधि प्रस्ताव भेजा। इसका जवाब देते हुए गोविंद सिंह ने मुगलों पर अपने तीरों की बरसात कर दी।
     22 दिसंबर की उस सर्द सुबह को वो एतिहासिक युद्ध शुरू हुआ। हल्की-फुल्की बारिश के बीच मुगलों ने किले पर हमला किया। मुगल सैनिक अच्छे किस्म की हथियारों से लैस थे। उनके पास तोप और गोला बारूद भी भारी मात्रा में था। हमले पर किले के अंदर से तीर और गोलियां मुगलों पर काल बनकर गिरा। युद्ध का मैदान मुगल सैनिकों की लाशों से पट गया। इतनी बड़ी सेना और हथियारों के बाद भी मुगल किले के पास आने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।
     जब सिखों के पास तीर और गोलियां खत्म हो गई तो तलवार और भाले से लड़ना जरूरी हो गया। गुरूजी ने पांच-पांच के जत्थों मे सैनिकों को भेजा। इधर तब तक मुगलों द्वारा किले पर किए गए हर हमले को सिक सैनिकों ने अपने बहादुरी से विफल कर दिया। एक सैनिकों ने हजारों-हजार मुगलों को काल के गाल में भेज दिया। इसी युद्ध में पंथ की रक्षा के लिए गुरूजी को 14 और 16 साल के पुत्र बी वीरदति को प्राप्त हो गए। शाम तक तो किले के नीचे का इलाका मुगलों की खून से रंग दिया गया। शाम तक उन 40 सिखों ने 100000 मुगलों को सेना को भारी क्षति पहुंचाई और तब भी किले तक नहीं पहुंचने दिया। शाम होते-होते 40 में सिर्फ 7 सैनिक गुरू जी के पास बचे। तब उन में से पांच सैनिको ने पांच प्यारे बनकर गुरूजी को यहां से सुरक्षित निकल जाने का आदेश दिया क्योंकि वो जानते थे कि गुरूजी ऐसे युद्धक्षेत्र से बाहर नहीं जाएंगे। तब गुरूजी ने 2 सैनिकों को साथ लिया और बांकि पांच को मोर्चे पर तैनात कर दिया।
      निकलते वक्त उसूलों पर चलते हुए उन्होंने मुगलों को ललकारा कि पीर ए हिंद जा रहा है, अगर किसी की हिम्मत हो तो रोक ले। इसी के साथ मशाल वालों को तीर मारी। मुगल सैनिक बरमा कर अंधेरे में आपसे में ही भीड़ गए। इससे उनका और ज्यादा नुकसान हुआ। इधर वो पांच प्यारे भी रणभूमि में अपनी आखिरी सांस तक डटे रहे लेकिन अंत में समंदर सी बड़ी मुगल फैज के सामने वो पांचो भी वीरगति को प्राप्त हुए।
      ये युद्ध इतिहास में अमर हो गया। मुग़ल सत्ताधरियों को यह एक करारी चपत थी। उन्हें उम्मीद थी कि कश्मीर, लाहौर, दिल्ली और सरहिन्द की समस्त मुग़ल शक्ति सात महीने आनन्दपुर का घेरा डालने के बावजूद भी न तो गुरू गोबिन्द सिंह जी को पकड़ सकी और न ही अपनी अधीनता स्वीकार करवा सकी। लाखों की संख्या में फौजी मारे गए पर मुग़ल अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त न कर सके। जफरनामा में इसका ज्रिक करते हुए गुरू गोविंद सिंह ने लिखा की जिनको आन प्यारी थी वो बलिदान हो गए और जिनको जान प्यारी थी वो मुसलमान हो गए।
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