कही आप ऐलुमिनियम के बर्तन में तो खाना नहीं बनाते है ?

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कही आप ऐलुमिनियम के बर्तन में तो खाना नहीं बनाते है ?

    आयुर्वेद में ऐलुमिनियम (स्फटयातु) के बर्तन वर्जित हैं। क्या आप जानते है ऐलुमिनियम के पात्रो में कुछ पकाकर खाना सबसे खतरनाक है और आधुनिक विज्ञान इसको मानता है।
    यहाँ तक कि आयुर्वेद में भी ऐलुमिनियम के पात्र वर्जित हैं। जिस पात्र में खाना पकाया जाता है, उसके तत्व खाने के साथ शरीर मे चले जाते हैं और क्योकि ऐलुमिनियम कमजोर धातू है इसलिये इसके खाने में मिलने का खतरा ज्यादा होता है और शरीर का ऐसक्रिटा सिस्टम इसको बाहर नहीं निकल पाता। ये अंदर ही इकट्ठा होता रहता हैं और बाद में टीबी और किडनी फ़ेल होने का कारण बनता है। आंकड़ों से पता चलता है जब से अंग्रेजों ने एल्युमिनियम के बर्तन भारत में भेजे हैं पेट के रोगों में बढ़ोत्तरी हुई है। 
    अंग्रेजों ने भगत सिंह, उधम सिंह, सुभाष चंद्र बोस जैसे जितने भी क्रांतिकारियों को जेल में डाला उन सबको जानबुझ कर ऐलुमिनियम के पात्रो में खाना दिया जाता था, ताकि वे जल्दी मर जायें।
    बड़े दुख की बात है आजादी के 67 साल बाद भी बाक़ी क़ानूनों की तरह ये कानून भी नहीं बदला नहीं गया हैं। आज भी देश की जेलो मे कैदियो को ऐलुमिनियम के पात्रो मे खाना दिया जाता है। लेकिन आज हमने अपनी इच्छा से अपने शौक से इसे प्रैशर कुकर के रूप में घर लाकर अपने बीमार होने और मरने का इंतजाम खुद कर लिया हैं।
    सिर्फ़ मिट्टी और पीतल के बरतन ही खाना पकाने के लिए सही बताए गए हैं और पहले हमारे यहाँ यही हुआ करते थे परन्तु नयी पीढ़ी ने खुद को चलांक और होशियार समझते हुए उन्हें ठिकाने लगा दिया। खास कर घर की महिलाओं ने पीतल बेंच कर एल्युमीनियम के हलके बर्तन लिए ताकि इस्तेमाल में हलके हों और पैसे भी खर्च करने को मिल जाएँ। आदमियों ने मिटटी के बर्तन लेना बंद कर दिए क्योंकि लाना और फेकना भी एक काम लगता है और वो आलसी हो गए हैं। इतने आलसी की खुद तो अपने बाप-दादा द्वारा लगाये गए पेड़ों से खूब फल खाए और आज की पीढ़ी को फल चखने को भी बाज़ार से खरीदने पड़ते हैं। खाने और परोसने में प्रयोग के लिए कांसा, तांबा और चांदी के बर्तन उपयुक्त होते हैं। आज कल उपयोग होने वाले स्टील के बर्तन भी एल्युमीनियम से काफी कम हानिकारक हैं।

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