Local for vocal लोकल से वोकल की मिसाल: रूपजी का खेड़ा की गुणवन्ती निनामा ने अर्जुन के पेड़ों से शुरू किया स्वरोजगार

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बांसवाड़ा: स्वयंसहायता समूह की महिलाओं का कमाल, जैविक तरीके से तैयार हो रहा अर्जुन छाल का पाउडर

Banswara News: बांसवाड़ा जिले में ग्रामीण महिलाएं अब स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर आत्मनिर्भरता की एक नई इबारत लिख रही हैं। प्रधानमंत्री वनधन योजना के तहत जिले के स्वयंसहायता समूह (SHG) से जुड़ी महिलाएं स्वरोजगार के नए अवसर तलाश रही हैं। इसी कड़ी में घाटोल ब्लॉक के रूपजी का खेड़ा गांव की महिलाओं द्वारा अर्जुन छाल का पाउडर (Arjun Chhal Powder, Arjuna bark powder, Terminalia arjuna bark powder) पूरी तरह से जैविक (Organic) प्रक्रिया से तैयार किया जा रहा है, जिसे बाजार में जबरदस्त प्रतिक्रिया मिल रही है।

स्वयंसहायता समूह की महिलाओं का कमाल, जैविक तरीके से तैयार हो रहा 'अर्जुन छाल का पाउडर'

रूपजी का खेड़ा की गुणवन्ती निनामा बनीं प्रेरणास्त्रोत

बांसवाड़ा जिले के घाटोल ब्लॉक स्थित ग्राम रूपजी का खेड़ा निवासी गुणवन्ती कुमारी निनामा ने अपनी मेहनत और सूझबूझ से एक मिसाल पेश की है। उनके खेत पर खड़े 10 से 11 अर्जुन के पेड़ों की छाल को बेकार जाने देने के बजाय, उन्होंने इसे उपयोगी उत्पाद में बदलने का विचार किया।

गुणवन्ती जी कड़ी धूप में छाल को सुखाकर, पारंपरिक और जैविक तरीकों से साफ कर इसे हाथों से पीसकर बारीक पाउडर तैयार कर रही हैं। इस पूरी प्रक्रिया में स्वच्छता और गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखा जाता है, जिससे उत्पाद का प्राकृतिक स्वरूप और औषधीय गुण बरकरार रहते हैं।

जैविक प्रक्रिया और गुणवत्ता पर विशेष जोर

  • प्राकृतिक संसाधन का सदुपयोग: स्थानीय स्तर पर उपलब्ध अर्जुन के पेड़ों की छाल को वैज्ञानिक और पारंपरिक तरीकों से संग्रहित किया जाता है।

  • पारंपरिक प्रसंस्करण: बिना किसी हानिकारक केमिकल के, पूरी तरह ऑर्गेनिक तरीके से छाल की सफाई, सुखाने और पिसाई का कार्य किया जाता है।

  • बढ़ती मांग: जैविक और शुद्ध होने के कारण इस अर्जुन छाल पाउडर की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे महिलाओं को लगातार नए ऑर्डर मिल रहे हैं।

ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की राह

प्रधानमंत्री वनधन योजना और स्थानीय संसाधनों के सही इस्तेमाल से आज ग्रामीण महिलाएं अपने परिवारों की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रही हैं। अर्जुन छाल पाउडर के निर्माण से महिलाओं में उद्यमिता की भावना विकसित हो रही है। महिलाओं का मानना है कि यदि ऐसे स्थानीय उत्पादों को और बेहतर बाजार और मंच मिले, तो ग्रामीण क्षेत्रों की हर महिला अपने हुनर के दम पर आत्मनिर्भर बन सकती है।

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