राजस्थान फार्मेसी काउंसिल में बीए पास को बना दिया रजिस्ट्रार, सेवानिवृत्ति से पहले ही 3 साल का एक्सटेंशन; हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
जयपुर / जोधपुर : राजस्थान स्टेट फार्मेसी काउंसिल (RSPC) में नियमों और दिशा-निर्देशों को दरकिनार कर की गई रजिस्ट्रार की नियुक्ति तथा सेवानिवृत्ति से पूर्व ही दिए गए सेवा विस्तार का मामला अब राजस्थान उच्च न्यायालय पहुंच गया है। फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) के स्पष्ट नियमों के बावजूद बीए (कला स्नातक) डिग्रीधारक सुनीता शर्मा को रजिस्ट्रार पद पर बैठाने और योग्य फार्मासिस्टों की उपेक्षा करने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर पीठ के न्यायाधीश मुकेश राजपुरोहित की एकलपीठ ने बाड़मेर निवासी और डिप्लोमा इन फार्मेसी (D.Pharma) योग्यताधारी भरत कुमार की याचिका (
S.B. Civil Writ Petition No. 20326/2026) पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया। अदालत ने याचिकाकर्ता को 7 दिनों के भीतर सक्षम प्राधिकारी के समक्ष नए सिरे से विस्तृत अभ्यावेदन (Representation) प्रस्तुत करने और राज्य सरकार को उस पर 6 सप्ताह में नियमानुसार निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं।
योग्य फार्मासिस्टों को दरकिनार कर लिपिक बनीं रजिस्ट्रार
अदालत में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता नमन मोहणोत ने पक्ष रखते हुए काउंसिल की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। याचिका में उल्लेख किया गया है कि फार्मेसी अधिनियम, 1948 और PCI द्वारा 1997 तथा 2025 में जारी परिपत्रों के अनुसार, स्टेट फार्मेसी काउंसिल का रजिस्ट्रार केवल एक 'पंजीकृत फार्मासिस्ट' होना चाहिए, जिसमें बी.फार्मा और डी.फार्मा डिग्रीधारकों को प्राथमिकता दी जानी तय है।
आरोप है कि 7 मई 2026 को हुई बैठक में सरकार को रजिस्ट्रार पद के लिए 4 योग्य पेशेवरों का पैनल भेजा गया था। इसके बावजूद, वर्ष 2000 में लिपिक (क्लर्क) के पद पर नियुक्त हुईं सुनीता शर्मा—जो केवल कला स्नातक हैं और गैर-पंजीकृत फार्मासिस्ट हैं—को रजिस्ट्रार के पद पर नियुक्त कर दिया गया।
सेवानिवृत्ति से पहले ही 3 साल की अवधि का सेवा विस्तार
मामले में पक्षपात का खुलासा करते हुए बताया गया कि सुनीता शर्मा 31 दिसंबर 2026 को 60 वर्ष की आयु पूर्ण कर सेवानिवृत्त होने वाली हैं। हालांकि, 16 जून 2026 की बैठक में उनकी सेवा अवधि को 1 जनवरी 2027 से 31 दिसंबर 2029 तक (तीन वर्ष के लिए) बढ़ा दिया गया।
याचिकाकर्ता ने इसे पद का दुरुपयोग और योग्य युवाओं के अधिकारों का हनन बताते हुए नियुक्ति व सेवा विस्तार दोनों को निरस्त करने की मांग की है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब राज्य सरकार को आगामी 6 सप्ताह के भीतर इस विवादास्पद नियुक्ति पर अपना निर्णय स्पष्ट करना होगा।