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हर महिला में लक्ष्मी जी निवास करती हैं......

     कहावत है-बिन घरनी घर भूत का डेरा। अर्थात घर घरवाली से ही बनता है अगर न हो तो समझो घर में भूत रह रहे हैं। घर की धूरी तो गृहलक्ष्मी ही होती है। उसी के इर्दगिर्द पति, सास-ससुर, अविवाहित देवर, ननद और बच्चे घूमते हैं। संयुक्त परिवार या फिर एकल परिवार सभी गृहलक्ष्मी-पत्नी पर ही निर्भर है इसलिए महिलाएं अवश्य लक्ष्मी जी के गुणों को लगातार स्मरण करे, दीवाली का यही सार्थक संदेश है। आज जब भौतिक सुख-सुविधाओं को दिलाने में धन की प्रभावशाली भूमिका है, तब कामकाजी पत्नी, नौकरी करती मां-बहन के कारण ही घर के पुरूष अपनी महत्वकाक्षां पूरी कर पाते हैं। भगवान शिव तभी शिव हैं जब तक आदि शक्ति उनके साथ है वरना वह उनके बिना शव ही है। मनुष्य की हालत भी यही होती है। महान कथाकार प्रेमचंद ने तो लिखा है-पुरूष के गुण अगर महिलाओं में आ जाए तो महिला कुलटा-भ्रष्ट हो जाती है लेकिन अगर महिलाओं के गुण पुरूषों में आ जाए तो वह संत हो जाता है। कहा भी गया है कि हर सफल पुरूष के पीछे एक महिला का ही हाथ होता है। श्रीमद्भागवत में तो स्पष्ट लिखा है कि हमें अर्थात पुरूषों को महिलाओं का सदैव आभारी होना चाहिए। उनकी प्रसन्नता, सहयोग और समर्पण के कारण ही पुरूष चारों पुरूषार्थ-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करने में सफल होता है।
     लक्ष्मी जी के विषय में शतपथ ब्राहमण में एक रोचक कथा है जिससे पता चलता है कि प्रजापति ब्रहमा ने उनकी उत्पत्ति की। वह अति सुंदर और गुणवती होने के साथ-साथ बहुत बुद्विमान भी थी। जैसे-जैसे उनके गुणों और सुंदरता की चर्चा चारों तरफ फैलने लगी वैसे- वैसे उनसे विवाह करने के लिए देवताओं में उत्सुकता जाग उठी। इससे देवताओं में एक-दूसरे के प्रति ईष्या और द्वेष भाव पनपने लगा। वैसे ही जैसे धन आने से हम मनुष्यों में अंहकार पेदा हो जाता है। जब सब आपस में ही लडने लगे और तब तय हुआ कि हम सब में फूट डालने वाली लक्ष्मी को ही समाप्त कर दो। इनके कारण फैली आपसी फूट से देवताओं की शक्ति क्षीण हो रही है। अपनी एकता को बरकरार रखने के लिए देवताओं ने उनके वध को ही उचित माना। अपनी पुत्री लक्ष्मी की जान खतरे में देखकर प्रजापति ने देवताओं ने प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि आप सब मेरी पुत्री लक्ष्मी का वध ना करें। इसके बदले आप उसके गुणों को ले लें। तब देवताओं ने राज्य, सत्ता, सृष्टि, शक्ति, धन, वैभव और सौंदर्य समेत सभी गुणों को लक्ष्मी जी से ले लिया। लक्ष्मी जी को इससे बडा दुख हुआ। उनकी सभी शक्तियां उनसे ली जा चुकी थी। उनका मन विचलित हो उठा और उन्होंने अपने सभी गुणों को पुनःपाने का निश्चय किया। पिता प्रजापति ने उन्हें निराश और दुखी देखा तो वह ओर दुखी हो उठे। तब प्रजापति ने उन्हें देवताओं को प्रसन्न करने के लिए तप करने का दुर्गम मार्ग बताया। लक्ष्मी जी को तप करना ठीक लगा। बरसों तपस्या करने के बाद उन्होंने उनसे नाराज देवताओं को प्रसन्न करने में कामयाबी हासिल की और वरदान स्वरूप उनसे अपनी सभी शक्तियां, अपने सभी गुण वापस ले लिए। लक्ष्मी जी ने जिस तरह से अपने गुणों की प्राप्ति की, उसी तरह से हर मनुष्य को खासकर महिलाओं को कठोर परिश्रम और भगवान की पूजा से लक्ष्मी जी को प्राप्त करना चाहिए। लक्ष्मी जी सत्य, दान, व्रत, तप और धर्म में निवास करती हैं।
     मार्कण्डेय पुराण में इस बात का उल्लेख है कि लक्ष्मी जी की र्स्वग में सर्वप्रथम पूजा नारायण ने की तो दूसरी बार ब्रहमा ने की। इसके बाद शिव जी, समुद्र मंथन के समय विष्णु जी, मनु, नागों और फिर हम मनुष्यों ने लक्ष्मी जी की पूजा शुरू की। यूं तो उल्लू को इनका वाहन माना जाता है पर महालक्ष्मी स्तोत्र में इनका वाहन गरूड बताया गया है। कुछ ग्रंथों में इनका वाहन हाथी को स्वीकारा गया है।
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रहमवैवर्त पुराण में आदि शक्ति के दो प्रमुख रूपों के विषय में बताते हुए कहा गया है कि यह दोनों रूप,रंग,तेज,गुण और आयु में समान ही हैं। इनके बाएं भाग में लक्ष्मी जी हैं तो दाएं भाग में श्री राधा जी-
एकैव सा द्विधाभूता वर्णरूपवयास्त्विषा। समा वामाशंतो लक्ष्मीर्दक्षिणांशाच्च राधिका।।
श्री राधा भगवान कृष्ण के साथ दो भुजाधारी रूप में विराजमान हैं तो श्री लक्ष्मी चतुभुर्ज रूप में भगवान श्री विष्णु के साथ सबकी इच्छाएं पूरी करती हैं
ं-द्विभुजे राधिका ज्ञेया लक्ष्मीः स्यात्सा चतुर्भुजे। सर्वांशने समौ बोध्यौ कृष्णनारायणो परौ।।
लेकिन लक्ष्मी जी अक्सर नाराज हो कर चली जाती है घरों से। क्यों होता है ऐसा? इस पर लक्ष्मी जी ने कहा है-
पितरौ पितरो देवा गुरुरतिथिजना न संतुष्टाः।
मिथ्यावादी स्थाप्यहरश्चालीकसाक्ष्यदाता च।।
     अर्थात जहां माता-पिता, पितर, देवगण, गुरुओं और मेहमानों को प्रसन्नता नहीं होती, झूठ बोलने वाले, झूठी गवाही , कसमें खाने वाले होते हैं मैं वहां निवास नहीं करती। कलियुग में इन बातों की बहुतायत है। ऐसे लोग , ऐसे घर परेशानियो में डूबे नजर आते हैं।
     लक्ष्मी जी ऐसे लोगों के यहां भी नहीं जाती जो सारे शरीर पर तेल मालिश करते समय पहले सिर पर तेल लगाते हैं। मतलब यह है कि हमेशा पैरों से तेल लगाना चाहिए अगर आप लक्ष्मी जी को प्रसन्न करना चाहते हैं। लक्ष्मी कहती है कि जो लोग अपनी पत्नी या पति से प्रेम नहीं करते, हिंसा में रूचि रखते हैं, ईश्वर में आस्था नहीं है और जिस घर की स्त्री बहुत गुस्सा और घमंड करने वाली हो, लोग घर में एक-दूसरे के प्रति बुरा नजरिया रखते हों, जलते हो, शाम को सोने वाले, न नहाने वाले, दूसरों की संपत्ति हड़पने वाले, गंदे कपड़े पहनने वाले और दूसरों के कामों में समस्या खड़े करने वाले लोंगो के नहीं होती हैं।
     स्वर्ग के राजा इन्द्र के यहां मौजूद समस्त सपंदा और पाताल में मौजूद असुरों के पास जो सपंदा है उसके पीछे भी लक्ष्मी जी ही हैं। गृहस्थ जीवन जी रहे लोगों के यहां मौजूद गृहलक्ष्मी असल में पत्नी या पुत्रवधु ही है। इनमें लक्ष्मी का जी का सोलहवां अशं होता है जिसमें उस समय कमी होने लगती है जब वह ईष्या या द्वेष वश अधार्मिक और सामाजिक अत्याचार करती है। परिवार में अंहकार के कारण समस्याएं खड़ी करती है, पति और सास-ससुर की हर बात का विरोध करती है।
(पं. भानुप्रतापनारायण मिश्र)