पहले ही दिखने लगती है। इस मेले में देश-विदेश से आने वाले असंख्य लोग भाग लेते हैं, जिसकी वजह से यह मेला भी रंग-बिरंगा हो जाता है। लेकिन इस मेले का सबसे रहस्यमयी रंग होते हैं नागा साधु, जिनका संबंध शैव परंपरा की स्थापना से है।कुंभ मेले में शैवपन्ती नगा साधुओं को देखने के लए भीड़ उमड़ पड़ती है. नगा साधुओं की रहस्यमय जीवन शैली और दर्शन को जानने के लए विदेशी श्रद्धालु ज़्यादा उत्सुक रहते हैं. कुंभ के सबसे पवित्र शाही स्नान में सबसे पहले स्नान का अधिकार इन्हें ही मिलता है.
नगा साधुओं का रूप
नगा साधु अपने पुर शरीर पर भभूत माले, निर्वस्त्र रहते हैं. उनकी बड़ी-बड़ी जताएँ भी आकर्षण का केंद्र रहती है. हाथों में छिलम लए और चरस का काश लगते हुए इन साधुओं को देखना अजीब लगता है. मस्तक पर अदा भभूत लगा, तिनदारी तिलक लगा कर ढूनी रामा कर, नग्न रह कर और गुफ़ाओं में ताप करने वाले नगा साधुओं का उल्लेख पौराणिक ग्रन्थों में भी मिलता है. यह साधु उग्र स्वाभाव के होते हैं. नगा जीवन की विलक्षण परणपारा में दीक्षित होने के लए वैराग्य भाव का होना ज़रूरी है. स्न्सार की मो-माया से मुक्त कठोर दिल वाला व्यक्ति ही नगा साधु बन सकता है. साधु बनाने से पूर्व ही ऐसे व्यक्ति को अपने हाथों से ही अपना ही श्राद्ध और पिंड दान करना होता है. अखाड़े किसी को आसानी से नगा रूप में स्वीकार नहीं करते. बाक़ायदा इसकी कठोर परीक्षा ली जाती है जिसमें ताप, ब्रह्मचारी, वैराग्य, ध्यान, संन्यास और धर्म का अनुशासन तथा निष्ठा आदि प्रमुखता से परखे-देखे जाते हैं. कठोर परीक्षा से गुजरने के बाद ही व्यक्ति संन्यासी जीवन की उच्चतम तथा अत्यन्त विकट परणपारा में शामिल होकर गौरव प्राप्त करता है. इसके बाद इनका जीवन अखाड़ों, स्न्त परणपराओं और समाज के लए समर्पित हो जाता है.[1]
नगा इतिहास
शणकराचारी ने सनातन धर्म की रक्षा के लए संन्यासी स्नघों का गठन किया था. बाहरी आक्रमण से बचाने के लए कालांतर में संन्यासियों के सबसे बड़े स्नघ जूना अखाड़े में संन्यासियों के एक वर्ग को विशेष रूप से शस्त्र-अस्त्र में पार्णगत करके स्न्स्थागत रूप प्रदान किया. वनवासी समाज के लोग अपनी रक्षा करने में समर्थ थे, और शस्त्र प्रवीण भी. इन्हीं शस्त्रधारी वनवासियों की जमात नगा साधुओं के रूप में सामने आई. ये नगा जैन और बौद्ध धर्म भी सनातन हिंदू परंपरा से ही निकले थे. वन, अरण्य, नामधारी संन्यासी उड़ीसा के जगन्नाथपुरी स्थित गोवर्धन पीठ से स्न्युक्त हुए. आज ष्न्टों के तेरह-चौदह अखाड़ों में सात संन्यासी अखाड़े (शैव) अपने-अपने नगा साधु बनाते हैं :- ये हैं जूना, महानिर्वानी, नीरन्जनी, अटल, अग्नि, आनन्द और आवाहन अखाड़ा.[1]
