वे मालदा तक आए, आप चुप रहे। टोंक में उन्होंने बवाल किया, आप चुप रहे। इंदौर से लेकर जयपुर तक वे सड़कों पर उतरे, आप खामोश थे। मुंबई के मैदान में उन्होंने शहीदों के स्मारकों को क्षति पहुंचायी, आप चुप रहे।आपकी चुप्पी से किसी को कोई हर्ज नहीं, कोई दिक्कत नहीं। आखिर सबके पास आपकी 1200 वर्षों की चुप्पी का इतिहास है।
बस, अपनी नाकामी को आध्यात्मिकता का चोला न पहनाइए। आपको धकेलने का सिलसिला भी पुराना है। वह तभी तय हो गया, जब आपके लिए कानून सरकार ने बनाए, लेकिन 'उनके' शरिया को कानून का दर्जा दे दिया गया।
धारा 370 से 1990 के दशक में कश्मीर में हुए जनसंहार तक आपको दीवार से सटाने का ही काम किया गया।
आपकी देवी-देवताओं की नंगी तस्वीरें कला में दर्ज हो गयीं और उन पर सिर्फ बहस और तकरीरें हुईं। Alternate Discourse के नाम से आपको अपमानित करने का पूरा दौर चला, लेकिन Satanic Verses से लेकर लज्जा तक को प्रतिबंधित किया गया, उनके लेखकों के पीछे से सरकार तक ने हाथ हटा लिया।
एक अखबार अगर सोशल मीडिया में हुई बहस (उनके पैगंबर के बारे में) को छाप देता है, तो उसकी प्रतियां जलती हैं, दफ्तर पर हमले होते हैं, आखिरकार उसे माफी मांगनी होती है।
यह पूरे देश में एक जैसा है- मलयालम अखबार हो या मराठी पत्रिका। मुसलमानों के खिलाफ तो छोड़िए, उनकी सच्चाई ही छापकर कोई दिखा दे।
यह सब क्यों है...
क्योंकि वे एक हैं। वे कितने भी पढ़े-लिखे हों, कुछ मामलों पर वे समझौता नहीं करते। आप अपनी आस्था और श्रद्धा के प्रश्नों पर भी डिबेट एंड डिस्कशन के लिए तैयार रहते हैं....बुद्धि का अजीर्ण मत कीजिए, हमलावर बनिए, अपने नाखून और दांत पैने कीजिए....और हां, सेकुलरिज्म और गंगा-जमुना तहज़ीब कहीं मिले, तो बताइएगा...। मुझे भी 25 ग्राम खरीदना है....
साभार
(Vyalok Pathak)
