चंद्रो कहती हैं कि बचपन में उन्हें निशाना लगाना अच्छा लगता था, लेकिन जिन्दगी की भागदौड़ में उनका यह शौक पीछे छूट गया। 65 वर्ष की उम्र में एक दिन वह अपनी पोती शेफाली को लेकर भारतीय निशानेबाज डॉक्टर राजपाल सिंह की शूटिंग रेंज पर गईं। वहां बच्चों की देखादेखी उन्होंने भी बंदूक उठा ली और फिर सटीक निशाना लगा दिया।
निशाना सही जगह लगता देख, शूटर राजपाल भी आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने चंद्रो से कहा- दादी तू भी शूटिंग शुरू कर दे। इसके बाद निशानेबाजी का यह सिलसिला चल निकला।
चंद्रो के लिए निशानेबाजी का यह सफर इतना आसान भी नहीं रहा। उन्होंने शूटिंग रेन्ज तक साथ जाने के लिए अपनी देवरानी प्रकाशी तोमर को भी तैयार कर लिया। प्रकाशी की उम्र उस वक्त 57 साल थी।
चंद्रो कहती हैं कि शुरु में उनके हाथ कांपते थे, लेकिन करीब 15 दिन बाद सब ठीक हो गया। उनके फोटो अखबार में छपे। उन्हें पढ़ना तो नहीं आता, लेकिन फोटो देखकर वह समझ गईं की माजरा आखिर क्या है। बाद में जब बेटों ने प्रेरित करना शुरू किया तो चंद्रो तोमर निशानेबाजी में पूरी तरह जुट गईं। अब चंंद्रो बच्चों, लड़कियों और बहुओं को शूटिंग सिखाती हैं।
