पर्दे के पीछे पर्दानशी है.......... किसी फिल्म के गाने के यह अल्फाज यही वंया कर रहे है कि पर्दे में छिपाया हुआ चेहरा लडकी का ही है। नकाबपोशी का यह अंदाज मुस्लिम वर्ग की महिलाओ मे बुरका से शुरू होकर आज सर्वजन में झलक रहा है। कभी मौसम तो कभी गोरे रंग को बचाने का बहाना, या फिर कभी बीमारी से बचने का उपाय, इन सभी का आॅप्शन सिर्फ एक और वह था नकाब। मगर जनबा अब तो नकाब से चेहरा छिपाने के पीछे राज कुछ जुदां है। कुछ युवाओं ने इसे फैशन में शुमार कर लिया है। इसके अलावा प्रेमिकायें अपने प्रेमी से मिलने को नकाब लगाने लगी तो युवक छेडखानी करने के दौरान पहचाने न जा सके इसलिये नकाब लगाने लगे। यही नही अपराधिक क्षेत्र में भी यह नकाब गुल खिला रहा है। नकाब का बढता के्रज सवाल खडा कर रहा है कि आखिर राज क्या है चेहरो के इन नकाब का़.........।लडका हो या लडकी ,पहनावा लगभग सेम टू सेम । वालो का अन्तर भी लगभग हो चुका है खत्म । अब बचा चेहरा तो उसे भी कर लिया नकाब मे कैद। अब भला नकाबपोश को पहचाने तो कैसे कि आखिर वह लडका है या लडकी। मानो हर नकाबपोश यह कहता हुआ नजर आ रहा है कि पहनावा कौन........।
गर्मी की तपिश से स्किन को सेफ रखने के लिये हालांकि कई काॅस्मेटिक है मगर नकाब ही पहली पसन्द क्यों। अब तो मौसम भी गर्म हो चला है लेकिन अब तो नकाब उतरने का सबाल ही नही उठता। आखिर चेहरा छिपाने का क्रेज क्यो युवाओ मे तेजी से बढा। इसके पीछे के गहराई को जाना तो समझ में आया कि यह नकाब न जाने कितने गुल खिलाने में माहिर है। कालेज में युवतियाॅ नकाब लगाकर अपने लवर के साथ लाॅग ड्राइव पर सबके सामने निकल जाती है और किसी को पता नही चलता कि वह कौन था या फिर कौन थी। यदि कपडो के पहनावे से यह समझ भी आ जाये कि वह लडकी ही है तो फिर यह नही पहचान सकते कि वह बीना थी या फिर रीमा। सभ्य समाज से लेकर आपराधिक किस्म के लोग भी इस नकाव का खूब फायदा उठा रहे है। बहाने भले ही अलग-अलग हो लेकिन नकाब को समाज के लिये सुरक्षित नही माना जा सकता है। आज के बदलते युग में जब युवाओ की सोच और जीवन शैली में बडा परिवर्तन आने लगा है तब यह नकाब उनके कई अनुचित कार्यो में भी मददगार साबित हो रहे है।
