मेरी गन कहां है ? गन दो, नक्सलियों से लड़ने जाना है ?

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       नक्सली हमले में बुरी तरह घायल BSF जवान जिंदगी से जंग लड़ते हुए मौत के करीब जा चुका था. लेकिन अचानक 25 दिनों बाद जवान कोमा की स्थिति से बाहर आया, होश आया और जुबां खोली तो कहा- 'मुझे नक्सलियों से लड़ने जाना है.' उसका जज्बा देख डॉक्टर नतमस्तक हो गए हैं. जवान के इस जज्बे को अब पूरा देश सलाम कर रहा है.
       नक्सली हमले में दाईं आंख और मस्तिष्क को चीरती हुई गोली पार निकल गई. दिमाग के नीचे की हड्डी टूट गई, दिमाग का शुरू से लेकर आखिरी तक का हिस्सा डैमेज हो गया. दिमाग की मुख्य नस फट जाने से जवान कोमा में जा पहुंचा 25 दिन तक जवान कृत्रिम सांस पर था, क्योंकि खुद की सांस जवाब दे चुकी थी. यह भारत माता के एक ऐसे सपूत की सच्ची दास्तां है, जिसने नक्सलियों को मात देते-देते मौत को भी चारों खाने चित कर दिया. मैं कहा हूँ ? 
     नगालैंड का रहने वाला सिर्फ 23 साल का BSF जवान "संगथम चोपसे" अस्पताल से घर नहीं, बल्कि वापस वहीं जाना चाहता है, जहां नक्सलियों की गोली उसे लगी थी. रामकृष्ण केयर अस्पताल के ICU में भर्ती संगथम ने कहा- 'मुझे बंदूक तो दे दो, नक्सलियों से लड़ूंगा, मारुंगा.'
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