एक अमर व्यक्ति जो कई वर्षों से इस शिवमंदिर में रोज पूजा करने आता है

Translate News:
    एमपी के बुरहानपुर में असीरगढ़ किले की शिवमंदिर में प्रतिदिन सबसे पहले पूजा करने आते है। शिवलिंग पर प्रतिदिन सुबह ताजा फूल एवं गुलाल चढ़ा मिलना अपने आप में एक रहस्य है। महाभारत काल से जुड़ी वो घटना जो आपको शायद ही मालूम होगा।  
     आठ चिरंजीवियों यानि जो अभी तक अमर है में से एक अश्वथामा के बारे में है ये रहस्य्मयी कहानी. पांडवो ने छल से युधिष्ठिर जिसने कभी जूठ नहीं बोला से अन्यथा में जूठ बुलवाया की अश्वथामा मारा गया, युधिष्ठिर ने ये नहीं बोला की वो हाथी है या गुरुपुत्र. ये सुन कर द्रोणाचार्य ने हथियार दाल दिए और उनका वध हो गया. इसका बदला लेने के लिए अश्वथामा ने रात्रि में पांडवो को मारना चाहा, निंद्रा में ही उसने सबको मार दिया पर जब उसे पता चला की वो उनके पुत्र थे तो उसे ग्लानि हुई पर दुर्योधन को जब भीम ने गद्दा युद्धों को तोड़ कर मार तो उसने पांडवो के मूल नाश का प्राण लिया और उतरा के गर्भ में पल रहे अभिमन्यु के पुत्र पर ब्रह्मास्त्र चला दिया.
     उसके प्रभाव से उतरा का पुत्र कोख में मर गया पर पांडवो द्वारा विलाप करने पर कृष्ण ने उसे पुनः जीवित कर दिया, इतने में अर्जुन और भीम अश्वथामा को पकड़ लए और मारने लगे. तब द्रौपदी ने उन्हें रोक और ब्रह्महत्या के पाप का स्मरण कराया. इस पर कृष्ण ने उसके सर पर लगी मणि( जो उसे हर मुसीबत से बचने में सक्षम थी) को उतरवा उसे अपमानित कराया और उसे श्राप दिया की अश्वथामा तूने जन्म देखा है पर तो मृत्यु नहीं देख पायेगा, यही तेरी सजा है.
     उसी श्राप के कारन आज भी वो असीरगढ़ के अलावा नर्मदा नदी के किनारे भी भटकते रहते हैं। स्थानीय निवासियों के अनुसार कभी-कभी वे अपने मस्तक के घाव से बहते खून को रोकने के लिए हल्दी और तेल की मांग भी करते हैं। गांव के कई पुराने लोगो की मानें तो जो एक बार अश्वत्थामा को देखता है, उसका दिमागी नियंत्रण डांवाडोल हो जाता है।
     किले में स्थित तालाब में स्नान करके अश्वत्थामा शिव मंदिर में पूजा-अर्चना करने जाते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि वे उतावली नदी में स्नान करके पूजा के लिए यहां आते हैं। आश्चर्य कि बात यह है कि पहाड़ की चोटी पर बने किले में स्थित यह तालाब बुरहानपुर की तपती गरमी में भी कभी सूखता नहीं। तालाब के थोड़ा आगे गुप्तेश्वर महादेव का मंदिर है। मंदिर चारो तरफ से खाइयों से घिरा है। किंवदंती के अनुसार इन्हीं खाइयों में से किसी एक में गुप्त रास्ता बना हुआ है, जो खांडव वन (खंडवा जिला) से होता हुआ सीधे इस मंदिर में निकलता है।
     इसी रास्ते से होते हुए अश्वत्थामा मंदिर के अंदर आते हैं। भले ही इस मंदिर में कोई रोशनी और आधुनिक व्यवस्था न हो, यहां परिंदा भी पर न मारता हो, लेकिन पूजा लगातार जारी है। शिवलिंग पर प्रतिदिन ताजा फूल एवं गुलाल चढ़ा रहता है।
    इतिहासविद ने बताया कि बुरहानपुर का महाभारतकाल से जुड़ा हुआ है। पहले यह जगह खांडव वन से जुड़ी हुई थी। किले का नाम असीरगढ़ यहां के एक प्रमुख चरवाहे आसा अहीर के नाम पर रखा गया था।
Loading...

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top