पिछले 91 साल से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहचान रही खाकी रंग की निकर की जगह अब भूरे रंग की पतलून लेगी। संघ ने राजस्थान के भिलवाड़ा की एक कंपनी को पतलून बनाने के ऑर्डर दे दिये हैं।बताया जा रहा है कि संघ की ओर से कंपनी को 10 लाख पतलून सिलने का ऑर्डर दिया गया है।
संघ की नीति निर्धारक इकाई अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की राजस्थान के ही नागौर में इस साल मार्च में हुई तीन दिवसीय सालाना बैठक में ड्रेस कोड बदलने का निर्णय लिया गया था।
सबसे पहले यह था ड्रेस कोड
साल 1925 में संघ की स्थापना के बाद से ढीला-ढाला खाकी निकर संगठन की पहचान रहा है। शुरू में 1940 तक संघ के गणवेश में खाकी कमीज और निकर होते थे। स्वयंसेवक खाकी टोपी भी लगाते थे।
किसने निर्धारित किया था पहला ड्रेस कोड?
संघ के पहले सरसंघचालक केशव बलराम हेडगेवार ने ड्रेस कोड निर्धारित किया था। बताया जाता है कि उन्होंने कांग्रेस सेवा दल से प्रभावित होकर यह ड्रेस कोड लागू किया था। सेवा दल कांग्रेस की मूल इकाई है और इसकी स्थापना 1924 में हुई थी।
निकर से क्यों हुई पतलून?
संघ के सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी ने कहा था कि आज के सामाजिक जीवन में पैंट नियमित रूप से शामिल है और इसी को देखते हुए हमने यह फैसला किया। पतलून के भूरे रंग के होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि इसकी कोई विशेष वजह नहीं है बल्कि यह आराम से उपलब्ध है और अच्छा दिखाई देता है।
बदला टोपी और कमीज का रंग
ब्रिटिश सरकार ने आरएसएस के गणवेष और इसके कदम-ताल के मार्ग (रूट मार्च) पर रोक लगा दी थी, जिसके बाद 1930 में खाकी टोपी की जगह काले रंग की टोपी ने ले ली। फिर 1940 में खाकी कमीज की जगह सफेद कमीज को ड्रेस कोड में शामिल कर लिया गया। संघ के वरिष्ठ विचारक एम जी वैद्य के अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद प्राइवेट संस्थानों के ड्रिल पर रोक लगा दी गई।
इंदिरा के आपातकाल के आसपास फिर बदला ड्रेस कोड
तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी की सरकार ने जब 1975-77 तक आपातकाल लगाया तो उसके आसपास फिर संघ का ड्रेस कोड बदला। इस बार नंबर था जूतों का। सेना के लंबे बूट ड्रेस कोड से बाहर हो गए और इनके जगह पर सामान्य काले जूते आ गए। संभवतः लंबे बूट वजनी होने के कारण बदल दिए गए। संघ की ताकत इसके स्वयंसेवक और इसकी शाखाएं हैं। देशभर में संघ की 56,859 शाखाएं हैं।
