वामपंथ के गढ़ जे.एन.यू. में गूंजेगा अब भारतीय संस्कृति का डंका

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जे.एन.यू. में पढाये जायेगे भारतीय संस्कृति के योग दर्शन व बैदिक दर्शन
     नई दिल्ली।। भारतीय संस्कृति के प्रति दुराग्रहों व संकीर्ण मानसिकता की दीवार अब देश के प्रतिष्ठित विश्व विद्यालय ‘जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय’ में ढहने सी गयी हें। इसका प्रतीक है दो बार नामंजूर करने के बाद आखिरकार जनेवि ने भारतीय संस्कृति के प्राण वैदिक संस्कृति के नाम से ‘योग दर्शन’ और ‘वैदिक संस्कृति’ सर्टिफिकेट कोर्स रूपि अल्पकालीन पाठय् क्रम के प्रस्ताव को 26 दिसम्बर को हुई अकेडमिक काउंसिल की महत्वपूर्ण बैठक में स्वीकार कर लिया है। इससे पहले जवाहर लाल नेहरू विवि की अकेडमिक काउंसिल ने नवंबर 2015 और इस साल अक्टूबर 2016 में इन दोनों को भारतीय संस्कृति के नाम से पाठ्यक्रम में स्वीकार करने मना कर दिया था।
     भारतीय संस्कृति के प्रतीक इन दोनों पाठय्क्रमों को लेकर संघ समर्थक छात्र संगठनों के समर्थन से चिढ़ कर वामपंथी मानसिकता के छात्र संगठनों व बुद्धिजीवियों ने नाहक ही इसका विरोध कर रहे थे। अब एक साल के इन दोनों सर्टिफिकेट कोर्स शैक्षणिक सत्र 2018-19 से शुरू होने की उम्मीद है। वहीं दूसरी तरफ स्पेशल सेंटर फॉर संस्कृत स्टडीज का सर्टिफिकेट कोर्स ‘कंप्यूटेशनल लिंग्विस्टिक संस्कृत’ नए सेशन यानी 2017 से शुरू हो जाएगा। इस प्रकार वामपंथ का गढ़ के रूप में चार दशकों से विख्यात रहा जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अब भारतीय संस्कृति का भी डंका बजेगा। अपनी नाक ऊंची रखने के लिए वामपंथियों ने भले ही इसे भारतीय संस्कृति के नाम के बजाय वैदिक संस्कृति के नाम से स्वीकार किया, परन्तु इसके शुरू होने से यह तय है कि अब जनेविवि में भी भारतीय संस्कृति का परचम लहरायेगा।

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