उल्लेखनीय है कि हमारे मस्तिष्क (ललाट) से ही तिलक, टीका, बिंदिया का संबंध इसलिए जोड़ा गया है कि सारे शरीर का संचालन कार्य वहीं करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य ने शिवनेत्र की जगह को ही पूजनीय माना है। पवित्र विचारों का उदय मस्तिष्क पर तिलक लगाने से होता है। ललाट के मध्य मानवशरीर का वह बिंदु है, जिससे निरंतर चेतन अथवा अचेतन दोनों अवस्थाओं में विचारों का झरना प्रवाहित होता रहता है। इसी को आज्ञाचक्र भी कहते हैं।
प्रमस्तिष्क, मस्तिष्क का वह ऊपरी भाग है, जो मनुष्य को देवता अथवा राक्षस, प्रकांड विद्वान अथवा मूर्ख बनाने की शक्ति रखता है। हमारी दोनों भौवों के बीच सुषुम्ना, इड़ा और पिंगला नाड़ियों के ज्ञानंततुओं का केंद्र मस्तिष्क ही है, जो दिव्य नेत्र या तृतीय नेत्र के समान माना जाता है। इस पर तिलक लगाने से आज्ञाचक्र जाग्रत होकर व्यक्ति की शक्ति को ऊर्ध्वगामी बनाता है, जिससे उसका ओज और तेज बढ़ता है।
शरीर शास्त्र की दृष्टि से यह स्थान पीयूष ग्रंथि (पीनियल ग्लैंड) का है, जहां अमृत का वास होता है। इसका स्त्राव सोमरस के तुल्य माना गया है। ललाट पर नियमित रूप से तिलक लगाते रहने से शीतलता तरावट एवं शांति का अनुभव होता है। मस्तिष्क के रसायनों का स्त्राव संतुलित रहने से मनोभावों में सुधार आकर उदासी दूर होती है। सिर दर्द की पीड़ा नहीं सताती और मेधाशक्ति तेज होती है। मन निर्मल होकर हमें सत्पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करता है। विवेकशीलता बनी रहती है और आत्मा विश्वास बढ़ता है।
आमतौर पर चंदन, कुंकुम, मृत्तिका व भस्म का तिलक लगाया जाता है। चंदन के तिलक लगाने से पापों का नाश होता है, व्यक्ति संकटों से बचता है, उस पर लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है, ज्ञान तंतु संयमि व सक्रिय रहते हैं, मस्तिष्क को शीतला और सांति मिलती है। कुंकुम में हल्दी का संयोजन होने से त्वचा को शुद्ध रखने में सहायता मिलती है और मस्तिष्क के स्नायुओं का संयोजन प्राकृतिक रूप में हो जाता है। संक्रामक कीटाणुओं को नष्ट करने में शुद्ध मृत्तिका का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। यज्ञ की भस्म का तिलक लगाने से ग्रहों की शांति होती है। तंत्रशास्त्र में वशीकरण आदि के लिए भी तिलक लगाया जाता है।
धर्मशास्त्र के अनुसार ललाच पर तिलक या टीका धारण करना एक आवश्यक कार्य है, क्योंकि यह हिंदू संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। कोई भी धार्मिक आयोजन या संस्कार बिना तिलक के पूर्ण नहीं माना जाता। जन्म से लेकर मृत्युशया तक इसका प्रयोग किया जाता है। यों तो देवी देवताओं, योगियों, संतों महात्माओं के मस्तक पर हमेशा तिलक लगा मिलता है, लेकिन आमलोगों में धार्मिक आयोजनों, पूजा पाठ, संस्कारों के अवसरों पर तिलक लगाने का प्रचलन है।
भारतीय परंपरा के अनुसार तिलक लगाना सम्मान का सूचक भी माना जाता है। अतिथियों को तिलक लगाकर विदा करते हैं, शुभयात्रा पर जाते समय शुभकामनाएं प्रकट करने के लिए तिलक लगाने की प्रथा प्राचीन काल से आ रही है। अर्थात् स्नान, होम, देव और पितृकर्म करते समय यदि तिलक न लगा हो, तो यह सब कार्य निष्फल हो जाते हैं। ब्राह्मण को चाहिए कि वह तिलक धारण करने के बाद ही संध्या, तर्पण आदि संपन्न करें।
शरीर शास्त्र की दृष्टि से यह स्थान पीयूष ग्रंथि (पीनियल ग्लैंड) का है, जहां अमृत का वास होता है। इसका स्त्राव सोमरस के तुल्य माना गया है। ललाट पर नियमित रूप से तिलक लगाते रहने से शीतलता तरावट एवं शांति का अनुभव होता है। मस्तिष्क के रसायनों का स्त्राव संतुलित रहने से मनोभावों में सुधार आकर उदासी दूर होती है। सिर दर्द की पीड़ा नहीं सताती और मेधाशक्ति तेज होती है। मन निर्मल होकर हमें सत्पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करता है। विवेकशीलता बनी रहती है और आत्मा विश्वास बढ़ता है।
आमतौर पर चंदन, कुंकुम, मृत्तिका व भस्म का तिलक लगाया जाता है। चंदन के तिलक लगाने से पापों का नाश होता है, व्यक्ति संकटों से बचता है, उस पर लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है, ज्ञान तंतु संयमि व सक्रिय रहते हैं, मस्तिष्क को शीतला और सांति मिलती है। कुंकुम में हल्दी का संयोजन होने से त्वचा को शुद्ध रखने में सहायता मिलती है और मस्तिष्क के स्नायुओं का संयोजन प्राकृतिक रूप में हो जाता है। संक्रामक कीटाणुओं को नष्ट करने में शुद्ध मृत्तिका का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। यज्ञ की भस्म का तिलक लगाने से ग्रहों की शांति होती है। तंत्रशास्त्र में वशीकरण आदि के लिए भी तिलक लगाया जाता है।
धर्मशास्त्र के अनुसार ललाच पर तिलक या टीका धारण करना एक आवश्यक कार्य है, क्योंकि यह हिंदू संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। कोई भी धार्मिक आयोजन या संस्कार बिना तिलक के पूर्ण नहीं माना जाता। जन्म से लेकर मृत्युशया तक इसका प्रयोग किया जाता है। यों तो देवी देवताओं, योगियों, संतों महात्माओं के मस्तक पर हमेशा तिलक लगा मिलता है, लेकिन आमलोगों में धार्मिक आयोजनों, पूजा पाठ, संस्कारों के अवसरों पर तिलक लगाने का प्रचलन है।
भारतीय परंपरा के अनुसार तिलक लगाना सम्मान का सूचक भी माना जाता है। अतिथियों को तिलक लगाकर विदा करते हैं, शुभयात्रा पर जाते समय शुभकामनाएं प्रकट करने के लिए तिलक लगाने की प्रथा प्राचीन काल से आ रही है। अर्थात् स्नान, होम, देव और पितृकर्म करते समय यदि तिलक न लगा हो, तो यह सब कार्य निष्फल हो जाते हैं। ब्राह्मण को चाहिए कि वह तिलक धारण करने के बाद ही संध्या, तर्पण आदि संपन्न करें।
