आज़ादी के लिए नाजाने कितने भारत माँ के लाल बलिदान हो गए, पर दुर्भागय से आज उनका कोई नाम भी नहीं जानता .....
उनमे से ही एक टंट्या भील जिसने अंग्रेजो से लोहा लिया, उनके विरोध में आवाज़ उठाई, वह उन हजारो क्रान्तिकारीयो में से एक थे जिन्होंने अंग्रेज़ो को छट्टी का ढूढ याद दिला दिया थ। टंट्या भील का जिसे टंट्या मामा या कहे भारत का रॉबिनहुड भी कहा जाता है। इनका जन्म मध्य प्रदेश के निमाद क्षेत्र में 1844 को हुआ था।
टंट्या के जीवन में बदलाव तब आया जब अंग्रेज़ो ने 1857 में अत्याचारो की सारी सीमाएं लांग दी, और तब टंट्या ने अंग्रेजो के खिलाफ जंग छेड़ दी।
उन्हें 1874 में उन्हें पहली बार जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। एक साल की जेल के बाद तो टंट्या के अंदर की चिंगारी शोला बन चुकी थी, और फिर टंट्या मामा ने अपना काम और जोरो शोरो से शुरू कर दिया।
टंट्या ने अनेको बार अंग्रेजो की खजाना ले जाती हुई ट्रेन को लूटा, और फिर उन खजाने को गरीबो और ज़रूरतमंदों में बाँट देते थे। 1878 में फिर उन्हें जेल डाला गया पर वो वहा से तीन ही दिन के अंदर भाग निकले।
टंट्या को गोरिला लड़ाई, भाला चलाना, चाकू चलाने में महारत हासिल थी, इसके इलावा मामा को बन्दूक चलाने में भी महारत हासिल थी।
टंट्या भील ने अंग्रेजो के नाक के नीचे से कई बार चलती ट्रेन से खजाना लूटा, कई बार उन्हें जेल में डाला गया पर हर बार वो भागने में कामयाब रहे।
टंट्या के इन्ही कारनामो से वो पुरे भारत में प्रसिद्ध हुए और उन्हें टंट्या मामा का नाम मिला। लोग उन्हें मामा कह कर पुकारते थे।
तक़रीबन 20 साल की कड़ी मुशक्कत के बाद टंट्या भील को पकड़ा गया। टंट्या मामा के पकडे जाने की खबर अंग्रेजी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी जिसमे उन्हें ROBINHOOD OF INDIA के नाम से 10 नवंबर 1889 में प्रसारित किया गया था।
इंदौर के जेल में उन्हें अनेको यातनाऐं दी गयी, और फिर उन्हें 19 oct. 1889 को फांसी की सजा दे दी गयी। अंग्रेजी सरकार को इतना डर था की आज तक ये पता नहीं चल पाया की उन्हें फांसी कब और कहा दी गयी। कहा जाता है उन्हें पातालपानी रेलवे स्टेशन खंडवा रूट पर उनकी बॉडी को फेंक दिया गया था। उसी जगह टंट्या मामा की समाधी बनी हुई है।
वहा आज भी जब भी कोई ट्रेन वहाँ से गुजरती है तो मामा को श्रदांजलि देने के लिए ट्रेन को 2 मिनट के लिए रोका जाता है। .
टंट्या मामा पर 2 फ़िल्म बी बन चुकी है। 1988 में दो वक़्त की रोटी, 2012 में टंट्या भील जिसे पांच भाषा में प्रसारित किया गया।
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