हिंदू धर्म में क्यों जरूरी है दान की परंपरा ? जानिए इससे जुड़ी खास बातें

0
Translate News:
Related image    हिंदू धर्म शास्त्रों में कुछ काम हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य बताए गए हैं। उनमें से अपने सामर्थ्य के अनुसार दान करना भी एक महत्वपूर्ण कार्य है। धर्म ग्रंथों के अनुसार हर व्यक्ति को अपनी कमाई का न्यूनतम दस प्रतिशत भाग जरूरतमंदों को दान करना चाहिए।
   दान का मतलब है देना। जो वस्तु स्वयं की इच्छा से देकर वापस न ली जाए उसे हम दान कहते हैं। दान में अन्न, जल, धन-धान्य, शिक्षा, गाय, बैल आदि दिए जाते हैं। परंपरा में दान को कर्तव्य और धर्म माना जाता है। शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है-
दानं दमो दया क्षान्ति: सर्वेषां धर्मसाधनम् ॥ -याज्ञवल्क्य स्मृति, गृहस्थ
अर्थ- दान, अन्त:करण का संयम, दया और क्षमा सभी के लिए सामान्य धर्म साधन हैं।
अहन्यहनि दातव्यमदीनेनान्तरात्मना ।
स्तोकादपि प्रयत्नेन दानमित्यभिध्यते ॥
 अर्थ- प्रत्येक दिन दान देना हमारा कर्तव्य है। यह समझकर अपने स्वल्प (जो भी हमारे पास उपलब्ध हो) में से प्रसन्न होकर प्रयत्नपूर्वक कुछ देना दान कहलाता है।
धर्मग्रंथों में दान के चार प्रकार बताए गए हैं। ये हैं-
नित्य दान- किसी के परोपकार की भावना और किसी फल की इच्छा न रखकर यह दान दिया जाता है।
नैमित्तिक दान- अपने पापों की शांति के लिए विद्वान ब्राह्मणों के हाथों पर यह दान रखा जाता है।
काम्य दान- संतान, जीत, सुख-समृद्धि और स्वर्ग प्राप्त करने की इच्छा से यह दान दिया जाता है।
विमल दान- जो दान ईश्वर की प्रसन्नता के लिए दिया जाता है।
दान का विधान किसके लिए :-
     दान का विधान हर किसी के लिए नहीं है। जो धन-धान्य से संपन्न हैं, वे ही दान देने के अधिकारी हैं। जो लोग निर्धन हैं और बड़ी कठिनाई से अपने परिवार की आजीविका चलाते हैं उनके लिए दान देना जरूरी नहीं है। ऐसा शास्त्रों में विधान है। कहते हैं कि कोई व्यक्ति अपने माता-पिता, पत्नी व बच्चों का पेट काटकर दान देता है तो उसे पुण्य नहीं बल्कि पाप मिलता है। खास बात यह कि दान सुपात्र को ही दें, कुपात्र को दिया दान व्यर्थ जाता है।
आय के दसवें भाग का दान :-
   ऐसा कहा गया है कि न्यायपूर्वक यानी ईमानदारी से अर्जित किए धन का दसवां भाग दान करना चाहिए। यह एक कर्तव्य है। इससे ईश्वर प्रसन्न होते हैं।
न्यायोपार्जितवित्तस्य दशमोशेन धीमत:।
कर्तव्यो विनियोगश्च ईश्वरप्रीत्यर्थमेव च ॥
अर्थ- न्याय से उपार्जित धन का दशमांश बुद्धिमान व्यक्ति को दान करना चाहिए।
दान एक सामाजिक व्यवस्था
   वास्तव में दान एक सामाजिक व्यवस्था है। समाज में इससे संतुलन बनता है। दान के कारण ही कई निर्धन परिवार के लोगों का भरण पोषण हो पाता है। भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि हर जीव में परमात्मा का वास है। अत: कोई व्यक्ति भूखा न रहे। दान धर्म से ही भारतीय संस्कृति अटूट है।
जैसा दान वैसा लाभ :-
   जीवन में हमें दान देने से कई लाभ होते हैं। कहते हैं जैसा दान होता है वैसा ही लाभ होता है। जानें, किस वस्तु के दान से क्या लाभ होता है-
वस्तु - लाभ
जल - तृप्ति
अन्न - अक्षय सुख
तिल - अभीष्ट संतान इच्छानुसार
स्वर्ण - लंबी उम्र
चांदी - अच्छा रूप
घर - उत्तम भवन
वस्त्र - चंद्रलोक
अश्व (घोड़े) - अश्विनीकुमार का लोक
बैल - बहुत सारी संपत्ति
गाय - सूर्यलोक
वाहन या शय्या - पत्नी
वेदाध्ययन - ब्रह्मा का सान्निध्य
ज्ञानोपदेश - स्वर्गलोक
गाय को घास - पापों से मुक्ति
लकड़ी - तेजस्विता
औषधि - सुख
भोजन - दीर्घायु
दीपदान - अच्छे नेत्र
अभयदान - ऐश्वर्य
ये हैं महान दानी :-
   हिंदू धर्म ग्रंथों में दान को जीवन का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। इन्हीं ग्रंथों में कुछ ऐसे महान दानियों का वर्णन भी मिलता है, जिन्होंने दान को अपना धर्म मान कर अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। जानिए उन महान दानियों के बारे में-
ऋषि दधीचि: ऋषि दधीचि भगवान शिव के परम भक्त थे। शिव के वरदान के कारण ही ऋषि दधीचि की अस्थियां अत्यंत कठोर हो गई थीं। देवताओं के मुख से यह जानकर कि मात्र उनकी अस्थियों से निर्मित वज्र द्वारा ही वृत्रासुर नामक असुर का वध किया जा सकता है, महर्षि दधीचि ने अपना शरीर त्याग कर अस्थियों का दान कर दिया था।
कर्ण: महाभारत के अनुसार कर्ण सूर्यपुत्र था, जो पांडवों की माता कुंती के गर्भ से कवच-कुंडल सहित जन्मा था। कवच कुंडल के रहते युद्ध भूमि में कोई भी उसका वध नहीं कर सकता था। यह जानते हुए भी कर्ण ने ब्राह्मण बनकर आए देवराज इंद्र को अपने कवच व कुंडल दान कर दिए थे।
राजा शिवि: प्राचीन काल में राजा शिवि नाम के एक दानवीर राजा थे। उनकी दानवीरता के बारे में जब देवराज इंद्र को पता चला तो उन्होंने राजा शिवि की परीक्षा लेने के बारे में सोचा। देवराज इंद्र की आज्ञा से अग्निदेव कबूतर बनकर अपनी प्राण रक्षा के लिए राजा शिवि के पास गए। स्वयं देवराज बाज बनकर उस कबूतर के प्राण हरने के उद्देश्य से वहां पहुंचे। बाज रूपी देवराज इंद्र के कहने पर कबूतर के प्राण बचाने के लिए राजा शिवि ने अपने शरीर का मांस भी दान कर दिया था।
राजा रंतिदेव: राजा रंतिदेव का नाम भी महान दानियों में लिया जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार राजा रंतिदेव के राज्य में भयंकर अकाल पड़ा। बिना अन्न और पानी से चारों ओर त्राहि-त्राहि मचने लगी। इस भयंकर अकाल के समय जब राजा के पास भी खाने को बहुत थोड़ा अन्न बचा था। उन्होंने वह भी प्रसन्नतापूर्वक दान कर दिया।
दान के बाद इसलिए जरूरी है दक्षिणा
   दान की महिमा को भारतीय सभ्यता में बड़े ही धार्मिक रूप में स्वीकार किया गया है। प्राचीन काल में ब्राह्मण को ही दान का सद्पात्र माना जाता था क्योंकि ब्राह्मण संपूर्ण समाज को शिक्षित करता था तथा धर्ममय आचरण करता था। ऐसी स्थिति में उनके जीवनयापन का भार समाज के ऊपर हुआ करता था। सद्पात्र को दान के रूप में कुछ प्रदान कर समाज स्वयं को सम्मानित हुआ मानता था।
   यदि आपके समर्पण का आदर करते हुए किसी ने आपके द्वारा दिया गया दान स्वीकार कर लिया तो आपको उसे धन्यवाद तो देना ही चाहिए। दान के बाद दी जाने वाली दक्षिणा, दान की स्वीकृति का धन्यवाद है। इसीलिए दान के बाद दी जाने वाली दक्षिणा का विशेष महत्व बताया गया है। इसका मनोवैज्ञानिक पक्ष है कि दान देने वाले व्यक्ति की इच्छाओं का दान लेने वाले व्यक्ति ने आदर किया है। इसीलिए वह धन्यवाद और कृतज्ञता ज्ञापित करने का पात्र भी है।

(Anil kaushal)

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)
Loading...

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top