जनता की उपेक्षा भाजपा को भारी पड़ी

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जनता की उपेक्षा भाजपा को भारी पड़ी

Image may contain: 1 person, outdoor      गोरखपुर एवं फूलपुर के लोकसभा-उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी की पराजय शर्मनाक तो मानी ही जाएगी, वह खतरे की गम्भीर घंटी भी है। प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा से प्रतिक्रिया पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि चूंकि अगले वर्ष लोकसभा का मुख्य चुनाव होना है, इसलिए स्वाभाविक रूप से इस उपचुनाव में हार का कोई महत्व नहीं है। उन्होंने इस तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट किया कि इतना कम प्रतिशत मतदान हुआ है कि उससे जनता के मूड का सही निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। श्रीकांत शर्मा का यह कथन ‘दिल बहलाने को गालिब ये खयाल अच्छा है’ वाला है। लेकिन इस शुतुरमुर्गी आचरण से सम्भावित खतरा न तो खत्म होगा और न टलेगा। वह बरकरार रहेगा तथा यदि उस खतरे का सही हल नहीं निकाला गया तो वह बहुत घातक सिद्ध हो सकता है। अभी-अभी भाजपा पूर्वोत्तर राज्यों में भगवा पताका फहरने से फूली नहीं समा रही थी। तय बात है कि पूर्वोत्तर राज्यों को नरेंद्र मोदी के शासन काल में पहली बार वैसा ही महत्व मिला, जैसा देश के बड़े राज्यों को मिलता है। वह निःसंदेह भाजपा की अभूतपूर्व एवं ऐतिहासिक उपलब्धि है। किन्तु वहां पर जनता के फैसले से उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के जनमत का आकलन नहीं किया जा सकता है।
     जहां तक उत्तर प्रदेश का प्रश्न है, वास्तविकता यह है कि यहां की जनता में इस समय सत्ता पक्ष के प्रति घोर नाराजगी है। वह अपने को बुरी तरह उपेक्षित महसूस कर रही है। ऐसी ही नाराजगी भाजपा-कार्यकर्ताओं में भी है। सपा एवं बसपा के लुटेरे शासनकाल की लम्बी यंत्रणा भुगतने के बाद जब उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने और उन्होंने शुरू में अपनी सरकार का जो जबरदस्त इकबाल स्थापित किया, उससे जनता में सुख की लहर व्याप्त थी। उसे लग रहा था कि योगी आदित्यनाथ के रूप में उसे सचमुच मसीहा मिल गया है। प्रदेश की जनता योगी आदित्यनाथ में विराट व्यक्तित्व के धनी नरेंद्र मोदी की छवि देखने लगी थी। लेकिन योगी आदित्यनाथ से चूक यह हुई कि वह अपने उस इकबाल को उसी तरह कायम नहीं रख सके। नरेंद्र मोदी के साथ उनके लिए बहुत लाभदायक बात यह थी कि उन्हें नृपेन्द्र मिश्र एवं अजित डोभाल-जैसे दो ऐसे रत्न मिल गए, जिनसे उन्हें बहुत मदद मिली। चूंकि भाजपा ने लोकसभा का पूरा चुनाव नरेंद्र मोदी के बल पर ही जीता था, इसलिए नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकने वाले सारे तत्व किनारे हो गए थे।
      उत्तर प्रदेश में भिन्न स्थिति थी। यहां तो योगी आदित्यनाथ को अपनी योग्यता एवं कलाकौशल के बल पर ही अपने इकबाल की छवि कायम रखनी थी। किन्तु उन्होंने अपेक्षित सावधानी नहीं बरती। सपा-बसपा के शासनकाल में घोटालों एवं भ्रष्टाचार द्वारा सैकड़ों व हजारों करोड़ धन बटोरने वाले अफसर पहले की तरह महत्वपूर्ण पदों पर काबिज रहे और मलाई काटते रहे। जनता आशा कर रही थी कि सभी भ्रष्ट अफसर एवं कर्मचारी जेल भेजे जाएंगे तथा उनकी अवैध रूप से अर्जित की हुई समस्त सम्पत्ति जब्त कर ली जाएगी। अब तक के शासनकाल में ईमानदार अफसर एवं कर्मचारी अपनी उपेक्षा के आदी हो चुके थे और किनारे पड़े हुए थे। आशा की जा रही थी कि अब उन्हें महत्व दिया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी प्रकार सपा-बसपा के शासनकाल में जिन भ्रष्ट पत्रकारों व अन्य लोगों ने जमकर चांदी काटी, वे योगी के शासनकाल में भी हर जगह महत्व पाते रहे तथा ईमानदार एवं वास्तविक पत्रकारों व अन्य लोगों की पूर्ववत उपेक्षा होती रही। जनता भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुख्यमंत्री योेगी से जिस जबरदस्त तलवारबाजी की अपेक्षा कर रही थी, वह उसे नहीं मिली। हमारे यहां भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे तक चप्पे-चप्पे में जिस गहराई से घुसा हुआ है, उससे जनता भीषण रूप से त्रस्त है। लेकिन योगी ने अपनी एक वर्ष की अवधि में जनता को उस यंत्रणा से मुक्त करने का सुअवसर गंवा दिया।
      जनता में फैले हुए असंतोष का दूसरा सबसे बड़ा कारण यह है कि चाहे भाजपा के सत्तावाले गलियारे में हो अथवा संगठन के क्षेत्र में, सभी जगह जनता की न तो समुचित सुनवाई होती है और न उसकी समस्याओं का कारगर हल निकाला जाता है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश मुख्यालय में बड़े - बड़ों की भीड़ तो दिखाई देती है, किन्तु आम कार्यकर्ता वहां अपने को पूरी तरह उपेक्षित महसूस करता है। सरकारी एवं संगठन, दोनों स्तरों पर निरंतर अपनी उपेक्षा होते रहने से कार्यकर्ता अंत में घर बैठ जाता है तथा न तो स्वयं वोट देने निकलता है और न अन्य मतदाताओं को घर से निकालकर मतदान-केंद्रों तक ले जाता है। जनता की समस्याओं के समाधान के लिए प्रदेश सरकार ने जो पोर्टल बना रखे हैं, वे दिखावटी सिद्ध हो रहे हैं। मुझे स्वयं ऐसे अनुभव हुए हैं कि मैंने जिस संदर्भ में शिकायत की, वहां मेरी शिकायत भेजने एवं उसका समाधान करने के बजाय वह शिकायत ऐसी जगह भेज दी गई, जिसका उससे कोई सम्बंध नहीं था। जनहित के कई कार्य कराने के लिए मैंने नगर विकास मंत्री सुरेश खन्ना को आधे दर्जन से अधिक बार पत्र लिखे, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। जनता की भांति पार्टी के आम कार्यकर्ता भी अपनी समस्याओं के समाधान के लिए इधर-उधर भटकने को मजबूर होते रहे, किन्तु उन्हें निराशा ही हाथ लगी। हाल में कल्याण सिंह ने मुझसे एक साक्षात्कार में कहा था कि गलत बात नहीं मानी जानी चाहिए, लेकिन सही बात की सुनवाई अवश्यमेव होनी चाहिए तथा इसमें जो भी अफसर या कर्मचारी गफलत करे, उसे कठोर दंड दिया जाना चाहिए।
      हमारे यहां एक बड़ी समस्या यह है कि गलत काम करने वाले को दंड का कोई भय नहीं रह गया है। सरकार जो भी फैसले करती है, उनका कारगर ढंग से पालन नहीं होता है। उदाहरणार्थ, पूरा प्रदेश अतिक्रमणों एवं अवैध निर्माणों की समस्या से बुरी तरह त्रस्त है। नित्य सड़कों पर भीषण जाम लगा रहता है, जिनमें फंसकर लोगों का कीमती समय तो नष्ट होता ही है, बीमारों की हालत बहुत बिगड़ जाती है। लोगों की जानें भी चली जाती हैं। लेकिन इस गम्भीर समस्या की ओर प्रशासन आंख बंद किए रहता है। जाम से मुक्ति दिलाने के बजाय हमारी पुलिस लोगों को हेलमेट पहनाने में जुट जाती है। चीनी तारों को बांधकर पतंगें उड़ाई जाती हैं, जिससे बिजली तो गायब होती ही है, लोग गंभीररूप से घायल भी हो जाते हैं। प्रतिबंध के बावजूद चीनी तार खुलेआम बिकतेे हैं, किन्तु किसी को दंडित नहीं किया जाता है। पाबंदी के बावजूद गुटखे अलानिया बिकते हैं। सड़कों व अन्य सभी जगह लोग पीक मार- मारकर गंदगी फैलाते हैं और मोदी के स्वच्छता-अभियान की धज्जी उड़ाते हैं, लेकिन कोई भी दंडित नहीं होता है। प्रतिबंध के बावजूद वाहनों में प्रेशरहाॅर्न व हूटरों का खुलकर इस्तेमाल होता है। ऐसे असंख्य उदाहरण भरे पड़े हैं।

(श्याम कुमार)

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