किसान-सरकार में तकरार की वजह है स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट

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किसान-सरकार में तकरार की वजह है स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट

     महात्मा गांधी ने 1946 में कहा था कि जो लोग भूखे हैं रोटी उनके लिए भगवान है. इसी कथन को अपना आधारभूत सिद्धांत बनाते हुए किसानों की समस्या का हल निकालने और उनके विकास का रास्ता तैयार करने के लिए 18 नवंबर 2004 को राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया गया था. इस आयोग के चेयरमैन विख्यात कृषि वैज्ञानिक और भारत में हरित क्रांति के जनक एम. एस. स्वामीनाथन को बनाया गया था. इस आयोग की मुख्य सिफारिश ये थी कि किसानों को उनकी फसलों का दाम उत्पादन लागत में 50 प्रतिशत बढ़ाकर दिया जाना चाहिए. इसका मतलब है कि फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) लागत का डेढ़ गुना होना चाहिए.
     सरकार कहती है कि वो एमएसपी लागत का डेढ़ गुना दे रहे हैं लेकिन फसलों की निर्धारित एमएसपी कुछ और ही चुगली करती है. दरअसल किसान संगठन कहते हैं कि सरकार फसलों की लागत कम कर के आंकती है इसलिए एमएसपी हमेशा ही कम होता है. बता दें कि फसलों की लागत कई तरीकों से तय की जाती है लेकिन स्वामीनाथन आयोग फसलों की सही लागत तय करने के लिए मूल्य C2 (कॉस्ट C2) की सिफारिश की थी.
     न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) किसानों के उत्पादन का वो मूल्य है जो कि सरकार द्वारा तय की जाती है. एमएसपी तय करने का मतलब है कि बाजार में एमएसपी के नीचे के दाम पर कोई भी अनाज नहीं खरीदा जाएगा. हालांकि वास्तविकता के धरातल पर ऐसा नहीं होता है. किसानों को अधिकतर समय एमएसपी से कम दाम पर अपना अनाज बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है. सरकार से उम्मीद की जाती है कि वे किसानों से एमएसपी पर अनाज खरीदेंगे और भविष्य की जरूरतों के लिए उसे इकट्ठा करेंगे. लेकिन शांता कुमार कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार देश के सिर्फ छह प्रतिशत किसान ही एमएसपी का लाभ ले पाते हैं. बाकि बचे किसानों को औने-पौने दाम पर प्राइवेट लोगों के हाथ अपना अनाज बेचना पड़ता है.
     फिलहाल कृषि मंत्रालय के अधीन संस्था कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफ़ारिश पर केंद्र सरकार फ़सलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है. इस समय कुल 23 फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाता है जिसमें से धान, गेहूं, ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, चना, तूर, कॉटन, सरसों, मसूर, कोपरा, सैफफ्लावर, सेसामम आदि शामिल हैं.
     स्वामीनाथ आयोग ने अपनी सिफारिश में कहा था कि न्यूनतम समर्थन मूल्य उत्पादन लागत में 50 प्रतिशत जोड़ कर दिया जाना चाहिए. इसका मतलब है कि किसान ने अपनी अनाज उगाने में जितनी राशि खर्च की होगी उसका डेढ़ गुना दाम उसे मिलना चाहिए. मान लीजिए अगर एक क्विंटल गेहूं पैदा करने में 1000 रूपये का खर्च आया है तो उस गेहूं को बेचने पर उसे 1500 रूपये मिलना चाहिए.
    लेकिन एमएसपी को तय करने में जहां सबसे बड़ी बाधा आती है वो है उत्पादन लागत को तय करना. सीएसीपी चार तरीके से उत्पादन लागत तय करती है.
Cost A1 :     मूल्य A1 को तय करते हुए बीज, कीटनाशक, खाद, फर्टीलाइजर, सिंचाई मूल्य, मशीनरी चार्ज जैसे कि ट्रैक्टर, थ्रेसर इत्यादि के चार्ज, कृषि मजदूरी, बैलों की मजदूरी, जमीन पर लगने वाले राजस्व सेस और टैक्स, खेती के लिए स्तेमाल होने वाले औजारों का चार्ज और अन्य खर्च इसमें शामिल किए जाते हैं.
Cost A2 :
मूल्य A2= मूल्य A1+ लीज पर ली गई जमीन का किराया
    मूल्य A2 तय करते समय मूल्य A1 के सभी चीजों को शामिल करते हुए इसमें लीज पर ली गई जमीन का किराया भी जोड़ा जाता है. देश के ज्यादातर किसान छोटे और मझोले किसान हैं जिनके पास एक एकड़ से कम की जमीन है. ऐसे छोटे किसान बड़े किसानों से लीज पर जमीन लेकर खेती करते हैं. इसलिए मूल्य A2 तय करते समय लीज पर ली गई जमीन का किराया भी शामिल किया जाता है. ये लागत मूल्य C1 के मुकाबले ज्यादा होता है.
Cost C2 :
मूल्य C2= A2+FL+ स्वामित्व वाली जमीन का किराया मूल्य और निश्चित पूंजी पर ब्याज
   मूल्य C2 का निर्धारण करने में मूल्य A2 के साथ परिवार की मजदूरी, स्वामित्व वाली जमीन का किराया मूल्य और निश्चित पूंजी पर ब्याज मूल्य भी शामिल किया जाता है. ये लागत मूल्य A1 और A2 के मुकाबले सबसे ज्यादा होता है.
     स्वामिनाथन आयोग रिपोर्ट की मुख्य सिफारिश थी कि किसानों को उत्पादन लागत C2 का डेढ़ गुना दिया जाना चाहिए. सरकार कहती है कि वे लागत का डेढ़ गुना दाम दे रहे हैं लेकिन फसलों की एमएसपी बताती है कि किसी भी फसल का दाम स्वामिनाथन सिफारिश के आधार पर नहीं है. दरअसल सरकार कुछ फसलों के लिए उत्पादन लागत(A2+FL) देती है लेकिन किसानों की मांग है कि उन्हें उत्पादन लागत(C2) में 50 प्रतिशत जोड़ कर दी जानी चाहिए. स्वामीनाथन कमेटी ने यहा सुझाव दिया था कि किसानों को (C2+50%) यानि कि उत्पादन लागत C2 का डेढ़ गुना दिया जाना चाहिए. लेकिन सरकार किसी भी फसले के लिए स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के हिसाब से दाम तय नहीं करती है.
    किसानों का विरोध इसी बात को लेकर है कि सरकार वादे करने के बाद भी न तो फसलों की एमएसपी सही तरीके से तय कर रही है और न ही किसानों की उपज को खरीद रही है. इसकी वजह से उन्हें सस्ते दामों पर प्राइवेट लोगों को अनाज बेचनी पड़ती है.


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