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जब पत्रकार महोदया ने अपनी बन्दुक किसी और के कंधे पर रख कर चला दी

     मोहतरमा का नाम 'स्वाति' है, इनका 'पेशा' पत्रकारिता है। बलात्कार जैसे विषय पर लिखने में इन्हें 'महारत' हासिल है। लल्लनटॉप जैसी 'सी ग्रेट' की साइट पर 'लेख' छपे तो पूछिए मत। मोहतरमा के लेख में 'तथ्यों' को परोसने के 'तिकड़म' को देखकर 'तर्क' भी पानी मांगने लगता है। 'क्रिएटिविटी का कीड़ा' इतना अंदर तक 'घुसा' है कि कोई 'पैंट' पर हाथ रखे तो सीधे 'जिप' के अंदर तक का 'रेखाचित्र' मस्तिष्क में उभरने लगता है। अभी हाल ही में 'लल्लनटॉप' पर 'मोहतरमा का एक लेख छपा है जिसमें 'रेप' करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत का कार्टून छपा है।
     बड़ी 'चालांकी' से लेख के 'शीर्षक' में लेखिका इस कार्टून को 'घिनौना बता रही हैं और बलात्कार की परिभाषा को कार्टून के आधार पर विवेचित कर रही हैं। लेखिका लिखती हैं, ''आज सुबह इस कार्टून पर नजर पड़ी. सामने एक औरत को लिटाया है। औरत पर पट्टी लगी है- जस्टिस सिस्टम.. यानी वो औरत आपके देश की ‘लाचार और अबला’न्याय व्यवस्था है। जो रो-चिल्ला रही है लेकिन खुद को छुड़ा नहीं पा रही। चार लोग उसे दबोचकर बैठे हैं। चारों के ऊपर चेहरे लगे हैं। एक के ऊपर प्रधानमंत्री 'नरेंद्र मोदी' का, दूसरे पर चीफ जस्टिस 'दीपक मिश्रा का, तीसरे पर राष्ट्रपति 'रामनाथ कोविंद' का, चौथे पर बीजेपी अध्यक्ष 'अमित शाह' का। इनके अलावा सामने की तरफ एक आदमी खड़ा है, बेल्ट खोल ली है, 'जिप' भी खोल ली है... अब बस 'पैंट' उतार रहा है... इस आदमी के ऊपर संघ के मुखिया मोहन भागवत का चेहरा पेस्ट है। कार्टून का भाव है कि देश की न्याय व्यवस्था सामने पड़ी एड़ियां 'घिसट' रही है और ये आदमी 'पैंट 'उतारकर जबरन उसकी 'योनि' में अपना लिंग डालने जा रहा है। बाकि के चारों इसकी 'मदद' कर रहे हैं, ये सब मिलकर उस औरत का 'बलात्कार' करने जा रहे हैं।''
     लेखिका दावा करती हैं कि उन्होंने इससे 'बीमार और घिनहा' कार्टून इससे पहले कभी नहीं देखा और लिख रही हैं कि इस कार्टून को 'सोशल मीडिया' पर जो लोग' शेयर' कर रहे हैं, उन्हें 'अंदाजा' भी नहीं है कि वो कितनी 'घटिया हरकत' कर रहे हैं। उसके आगे व्याख्या करती हैं कि 'न्याय व्यवस्था' की मजबूरी दिखाने के लिए तुम्हें औरत ही मिली है और आखिरी में लिखती हैं कि ऐसा 'विरोध मेरी जूती पर'...। चलो मान लिया कि 'न्याय व्यवस्था' को मजबूर दिखाने के लिए औरत का 'कार्टून' लगाना गलत है लेकिन यह कहां तक सही है कि देश के किसी 'सास्कृतिक संगठन' के मुखिया को 'जिप' खोलते हुए उसकी व्याखा करना। देश के प्रधानमत्री को 'रेपिस्ट' की उपमा देना किस 'मानसिकता' का द्यौतक है। मोहतरमा तो अपनी व्याख्या में यहां तक लिख रही हैं कि 'कार्टून देखकर ऐसा लगता है कि जैसे बी ग्रेड की फिल्मों में 'विलेन' पैंट उतारते हुए कहता है कि आ तेरी गर्मी उतारता हूं... '
    'सो कॉल्ड लेखिका' महोदय पहले आप अपने दिमाग की 'गर्मी को शांत' करिए और विरोध के नाम पर जो दिमाग में 'कचरा' भरा है उसे किसी 'अच्छे डॉक्टर' को दिखाकर निकलवाइये। जिस तरह 'न्याय व्यवस्था' की 'मजबूरी' को दिखाने के लिए 'महिला' का छायाचित्र गलत है उसी तरह 'विरोध' के लिए लिखे गये इस कार्टून में मोहन भागवत, पीएम मोदी जैसों को 'लपेटना' भी गलत है। 'सस्ती लोकप्रियता' के लिए लिखना ही है तो 'अश्लील साहित्य' का लेखन शुरू कर दीजिए। शायद 'लोकप्रियता' के साथ 'आत्मिक शांति' भी मिलेगी और हां एक लाइन तो लिखना भूल गया था..'तुम्हारे जैसा लेख मेरे जूते पर'...। 
 
 
साभार :  
अवनीश सिंह 'राजपूत'