फ़र्ज़ी ख़बरों के लिए पत्रकारों को ब्लैकलिस्ट करने के फैसले पर इतनी कड़ी प्रतिक्रिया हुई कि ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दख़ल देना पड़ा और सूचना-प्रसारण मंत्रालय यह फैसला वापस लेने को बाध्य हुआ.कई पत्रकारों ने मंत्रालय के इस फैसले का यह कहते हुए विरोध किया था कि यह मीडिया पर नियंत्रण लगाने की सरकारी कोशिश है.
इसी दिन यानी दो अप्रैल को ही प्रेस क्लब में कई पत्रकार जुटे और वहां इसके आयामों पर चर्चा की गई. यह भी कहा गया कि इस सर्कुलर के आधार पर फ़र्ज़ी ख़बरों की मनमाफिक व्याख्या करके सरकार मुश्किल सवाल पूछने वाले पत्रकारों को ठिकाने लगा सकती है. प्रधानमंत्री ने यह फैसला तो वापस ले लिया, लेकिन यह सवाल अब कुछ अरसे से फिज़ा में तैर रहा है कि क्या मोदी सरकार मीडिया की बांहें मरोड़ना चाहती है?
कहना शायद ग़लत न होगा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे पत्रकारों में कई ऐसे लोग आए हैं जो बिल्कुल पेशेवर नहीं हैं. मैं उन्हें पत्रकार नहीं मानता. वे केवल प्रोपेगैंडा की पत्रकारिता कर रहे हैं. वे किसी पार्टी या विचारधारा से जुड़े होते हैं और उससे जुड़ी फ़र्ज़ी ख़बरें प्रसारित करते हैं.
आपकी विचारधारा होनी जायज़ है.
आप अपनी विचारधारा लोगों के सामने रख भी सकते हैं, लेकिन अपनी विचारधारा के प्रसार के लिए ख़बरों को ग़लत या फर्ज़ी या भड़काऊ रूप में सामने रखना बिल्कुल ग़लत है. ऐसे लोगों की वजह से जनता में मीडिया की विश्वसनीयता कम हुई है और उसी का फायदा उठाकर सरकार मीडिया को काबू करने की कोशिशें कर रही है.
