तो यह है दलित-मुस्लिम (भीम-मीम) गठजोड़ की हक़ीक़त ?

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तो यह है दलित-मुस्लिम (भीम-मीम) गठजोड़ की हक़ीक़त ?

Image may contain: 2 peopleआलेख लंबा जरूर है पर मौजू है, तथ्य, सत्य और कथ्य से भरपूर जरूर पढ़ें,

     आजकल देश में दलित राजनीति की चर्चा जोरों पर है। इसका मुख्य कारण नेताओं द्वारा दलितों का हित करना नहीं अपितु उन्हें एक वोट बैंक के रूप में देखना हैं। इसीलिए हर राजनीतिक पार्टी दलितों को लुभाने की कोशिश करती दिखती है। अपने आपको सेक्युलर कहलाने वाले कुछ नेताओं ने एक नया जुमला उछाला है। यह जुमला है दलित-मुस्लिम एकता। इन नेताओं ने यह सोचा कि दलितों और मुस्लिमों के वोट बैंक को संयुक्त कर दे दे तो 35 से 50 प्रतिशत वोट बैंक आसानी से बन जायेगा और उनकी जीत सुनिश्चित हो जाएगी। जबकि सत्य विपरीत है। दलितों और मुस्लिमों का वोट बैंक बनना असंभव हैं। क्योंकि जमीनी स्तर पर दलित हिन्दू समाज सदियों से मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा प्रताड़ित होता आया हैं।
      यह एक कड़वी सच्चाई है कि मुसलमानों ने दलितों को मैला ढोने के लिए बाध्य किया क्योंकि भारत देश में मैला ढोने की कुप्रथा कभी नहीं थी। मुस्लिम समाज में बुर्के का प्रचलन था। इसलिए घरों से शौच उठाने के लिए हिंदुओं विशेष रूप से दलितों को मैला ढोने के लिए बाधित किया गया। जो इस्लाम स्वीकार कर लेता था। वह इस अत्याचार से छूट जाता था। धर्म स्वाभिमानी दलित हिंदुओं ने अमानवीय अत्याचार के रूप में मैला ढोना स्वीकार किया। मगर अपने पूर्वजों का धर्म नहीं छोड़ा। फिर भी अनेक दलित प्रलोभन और दबाव के चलते मुसलमान बन गए।
      इस्लाम स्वीकार करने के बाद भी दलितों को बराबरी का दर्जा नहीं मिला। इसका मुख्य कारण इस्लामिक भेदभाव था। डॉ अम्बेडकर इस्लाम में प्रचलित जातिवाद से भली प्रकार से परिचित थे। वे जानते थे कि मुस्लिम समाज में अरब में पैदा हुए मुस्लिम (शुद्ध रक्त वाले)अपने आपको उच्च समझते है और धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बने भारतीय दूसरे दर्जे के माने जाते हैं। अपनी पुस्तक पाकिस्तान और भारत के विभाजन, अम्बेडकर वांग्मय खंड 15 में उन्होंने स्पष्ट लिखा है- ‘अशरफ’ अथवा उच्च वर्ग के मुसलमान (प) सैयद, (पप) शेख, (पपप) पठान, (पअ) मुगल, (अ) मलिक और (अप) मिर्जा और ‘अजलफ’ अथवा निम्न वर्ग के मुसलमान। इसलिए जो दलित मुस्लिम बन गए वे दूसरे दर्जे के ‘अजलफ’ मुस्लिम कहलाये। उच्च जाति वाले ‘अशरफ’ मुस्लिम नीच जाति वाले ‘अजलफ’ मुसलमानों से रोटी-बेटी का रिश्ता नहीं रखते। ऊपर से शिया-सुन्नी, देवबंदी-बरेलवी के झगड़ों का मतभेद। सत्य यह है कि इस्लाम में समानता और सदभाव की बात करने और जमीनी सच्चाई एक दूसरे के विपरीत थी। इसे हम हिंदी की प्रसिद्द कहावत चौबे जी गए थे छबे जी बनने दुबे जी बन कर रह गए से भली भांति समझ सकते है।
       दलितों ने देखा कि इस्लाम के प्रचार के नाम पर मुस्लिम मौलवी दलित बस्तियों में प्रचार के बहाने आते और दलित हिन्दू युवक-युवतियों को बहकाने का कार्य करते। दलित युवकों को बहकाकर उन्हें गोमांस खिला कर अपभ्रष्ट कर देते थे और दलित लड़कियों को भगाकर उन्हें किसी की तीसरी या चौथी बीवी बना डालते थे। दलित समाज के होशियार चौधरियों ने इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए एक व्यावहारिक युक्ति निकाली। उन्होंने प्रतिक्रिया रूप से दलितों ने सूअरों को पालना शुरू कर दिया था। एक सुअरी के अनेक बच्चे एक बार में जन्मते। थोड़े समय में पूरी दलित बस्ती में सूअर ही सूअर दिखने लगे। सूअरों से मुस्लिम मौलवियों को विशेष चिढ़ थी। सूअर देखकर मुस्लिम मौलवी दलितों की बस्तियों में इस्लाम के प्रचार करने से हिचकते थे। यह एक प्रकार का सामाजिक बहिष्कार रूपी प्रतिरोध था। आप अब समझ सकते है कैसे सूअरों के माध्यम से दलितों ने अपनी धर्मरक्षा की थी। उनके इस कदम से उनकी बस्तियां मलिन और बिमारियों का घर बन गई। मगर उन्हें मौलवियों से छुटकारा मिल गया।
      जैसे सवर्ण हिन्दू समाज मुसलमानों के अत्याचारों से आतंकित था, वैसे ही हिन्दू दलित भी उनके अत्याचारों से पूरी तरह आतंकित था। यही कारण था जब जब हिंदुओं ने किसी मुस्लिम हमलावर के विरोध में सेना को एकत्र किया। तब तब सवर्ण एवं दलित दोनों हिंदुओं ने बिना किसी भेदभाव के एक साथ मिलकर उनका प्रतिवाद किया। तैमूर लंग ने जब भारत देश पर हमला किया तो उसने क्रूरता और अत्याचार की कोई सीमा नहीं थी। तैमूर लंग के अत्याचारों से पीड़ित हिन्दू जनता ने संगठित होकर उसका सामना करने का निश्चय किया। खाप नेता धर्मपालदेव के नेतृत्व में पंचायती सेना को एकत्र किया गया। इस सेना के दो उपप्रधान सेनापति थे। इस सेना के सेनापति जोगराजसिंह नियुक्त हुए थे जबकि उपप्रधान सेनापति झ्र धूला भंगी (वाल्मीकि) और हरबीर गुलिया जाट चुने गये। धूला भंगी हिसार के हांसी गांव का निवासी था। यह महाबलवान, निर्भय योद्धा, गोरीला (छापामार) युद्ध का महान् विजयी धाड़ी था। जिसका वजन 53 धड़ी था। उपप्रधान सेनापति चुना जाने पर इसने भाषण दिया कि ‘मैंने अपनी सारी आयु में अनेक धाड़े मारे हैं। आपके सम्मान देने से मेरा खूब उबल उठा है। मैं वीरों के सम्मुख प्रण करता हूं कि देश की रक्षा के लिए अपना खून बहा दूंगा तथा सर्वखाप के पवित्र झण्डे को नीचे नहीं होने दूंगा। मैंने अनेक युद्धों में भाग लिया है तथा इस युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान दे दूंगा।’ यह कहकर उसने अपनी जांघ से खून निकालकर प्रधान सेनापति के चरणों में उसने खून के छींटे दिये। उसने म्यान से बाहर अपनी तलवार निकालकर कहा ‘यह शत्रु का खून पीयेगी और म्यान में नहीं जायेगी।’ इस वीर योद्धा धूला के भाषण से पंचायती सेना दल में जोश एवं साहस की लहर दौड़ गई और सबने जोर-जोर से मातृभूमि के नारे लगाये। (जाट वीरों का इतिहास : दलीप सिंह अहलावत)
      दूसरा उपप्रधान सेनापति हरबीर सिंह जाट था। यह हरियाणा के रोहतक जिले के गांव बादली का रहने वाला था। इसकी आयु 22 वर्ष की थी और इसका वजन 56 धड़ी (7 मन) था। यह निडर एवं शक्तिशाली वीर योद्धा था। उप-प्रधानसेनापति हरबीरसिंह गुलिया ने अपने पंचायती सेना के 25,000 वीर योद्धा सैनिकों के साथ तैमूर के घुड़सवारों के बड़े दल पर भयंकर धावा बोल दिया, जहां पर तीरों तथा भालों से घमासान युद्ध हुआ। इसी घुड़सवार सेना में तैमूर भी था। हरबीरसिंह गुलिया ने आगे बढ़कर शेर की तरह दहाड़ कर तैमूर की छाती में भाला मारा जिससे वह घोड़े से नीचे गिरने ही वाला था कि उसके एक सरदार खिजर ने उसे सम्भालकर घोड़े से अलग कर लिया। तैमूर इसी भाले के घाव से ही अपने देश समरकन्द में पहुंचकर मर गया। वीर योद्धा हरबीरसिंह गुलिया पर शत्रु के 60 भाले तथा तलवारें एकदम टूट पड़ीं जिनकी मार से यह योद्धा अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ा। उसी समय प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर ने अपने 22000 मल्ल योद्धाओं के साथ शत्रु की सेना पर धावा बोलकर उनके 5000 घुड़सवारों को काट डाला। जोगराजसिंह ने स्वयं अपने हाथों से अचेत हरबीर सिंह को उठाकर यथास्थान पहुंचाया। परन्तु कुछ घण्टे बाद यह वीर योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गया। हरद्वार के जंगलों में तैमूरी सेना के 2805 सैनिकों के रक्षादल पर भंगी कुल के उपप्रधान सेनापति धूला धाड़ी वीर योद्धा ने अपने 190 सैनिकों के साथ धावा बोल दिया। शत्रु के काफी सैनिकों को मारकर ये सभी 190 सैनिक एवं धूला धाड़ी अपने देश की रक्षा हेतु वीरगति को प्राप्त हो गये।
      हमारे महान इतिहास की इस लुप्त प्राय: घटना को यहां बताने के दो प्रयोजन है। पहला तो यह सिद्ध करना कि हिन्दू समाज को अगर अपनी रक्षा करनी है तो उसे जातिवाद के भेद को भूलकर संगठित होकर विधर्मियों का सामना करना होगा। दूसरा इससे यह भी सिद्ध होता है कि उस काल में जातिवाद का प्रचलन नहीं था। धूला भंगी (बालमीकी) अपनी योग्यता, अपने क्षत्रिय गुण,कर्म और स्वभाव के कारण सवर्ण और दलित सभी की मिश्रित धर्मसेना का नेतृत्व किया। जातिवाद रूपी विषबेल हमारे देश में पिछली कुछ शताब्दियों में ही पोषित हुई। वर्तमान में भारतीय राजनीति ने इसे अधिक से अधिक गहरा करने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया। भक्ति काल के दलित संतों जैसे रविदास, कबीरदास द्वारा इस्लाम की मान्यताओं की कटु आलोचना की गई।
      अगर इस्लाम दलितों के लिए हितकर होता तो हिन्दू समाज में उस काल में धर्म के नाम पर प्रचलित अन्धविश्वास और अंधपरंपराओं पर तीखा प्रहार करने वाले दलित संत इस्लाम की भरपेट प्रशंसा करते। इसके विपरीत भक्ति काल के दलित संतों जैसे रविदास, कबीरदास द्वारा इस्लाम की मान्यताओं की कटु आलोचना करते मिलते है।
     दलित संत वेद, तीर्थ, जप, राम-कृष्ण, यज्ञपवीत, गौरक्षा आदि वैदिक परम्पराओं में अटूट विश्वास रखते थे एवं इस्लाम की मान्यताओं के कटु आलोचक थे।
     डॉ अम्बेडकर को इस्लाम स्वीकार करने के अनेक प्रलोभन दिए गए। स्वयं उस काल में विश्व का सबसे धनी व्यक्ति हैदराबाद का निजाम इस्लाम स्वीकार करने के लिए बड़ी धनराशि का प्रलोभन देने आया। मगर जातिवाद का कटु विष पीने का अनुभव कर चुके डॉ अम्बेडकर ने न ईसाई मत को स्वीकार किया और न इस्लाम मत को स्वीकार किया। क्योंकि वह जानते थे कि इस्लाम मत स्वीकार करने से दलितों का किसी भी प्रकार से हित नहीं हो सकता। अपनी पुस्तक भारत और पाकिस्तान के विभाजन में उन्होंने इस्लाम मत पर अपने विचार खुल कर प्रकट किये है, इसीलिए उन्होंने 1947 में पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले सभी हिन्दू दलितों को भारत आने का निमंत्रण दिया था।
     डॉ आंबेडकर ने कहा था कि मुसलमानों द्वारा राजनीति में अपराधियों के तौर-तरीके अपनाया जाना है। दंगे इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि गुंडागिर्दी उनकी राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है। महत्व की बात यह है कि धर्मांध मुसलमानों द्वारा कितने प्रमुख हिन्दुओं की हत्या की गई। मूल प्रश्न है उन लोगों के दृष्टिकोण का, जिन्होंने यह कत्ल किये। जहाँ कानून लागू किया जा सका, वहाँ हत्यारों को कानून के अनुसार सजा मिली; तथापि प्रमुख मुसलमानों ने इन अपराधियों की कभी निंदा नहीं की। इसके विपरीत उन्हें ‘गाजी’ बताकर उनका स्वागत किया गया और उनके क्षमादान के लिए आन्दोलन शुरू कर दिए गए। इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण है लाहौर के बैरिस्टर मि. बरकत अली का, जिसने अब्दुल कयूम की ओर से अपील दायर की। वह तो यहाँ तक कह गया कि कयूम नाथूराम की हत्या का दोषी नहीं है, क्योंकि कुरान के कानून के अनुसार यह न्यायोचित है। मुसलमानों का यह दृष्टिकोण तो समझ में आता है, परन्तु जो बात समझ में नहीं आती, वह है श्री गांधी का दृष्टिकोण।
     डॉ आंबेडकर ने कहा था कि हिन्दू-मुस्लिम एकता की विफलता का मुख्य कारण इस अहसास का न होना है कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जो भिन्नताएं हैं, वे मात्र भिन्नताएं ही नहीं हैं, और उनके बीच मनमुटाव की भावना सिर्फ भौतिक कारणों से ही नहीं हैं। इस विभिन्नता का स्रोत ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक दुर्भावना है, और राजनीतिक दुर्भावना तो मात्र प्रतिबिंब है। ये सारी बातें असंतोष का दरिया बना लेती हैं जिसका पोषण उन तमाम बातों से होता है जो बढ़ते-बढ़ते सामान्य धाराओं को आप्लावित करता चला जाता हैं दूसरे स्रोत से पानी की कोई भी धारा, चाहे वह कितनी भी पवित्र क्यों न हो, जब स्वयं उसमें आ मिलती है तो उसका रंग बदलने के बजाय वह स्वयं उस जैसी हो जाती हैं दुर्भावना का यह अवसाद, जो धारा में जमा हो गया हैं, अब बहुत पक्का और गहरा बन गया है। जब तक ये दुर्भावनाएं विद्यमान रहती हैं, तब तक हिन्दू और मुसलमानों के बीच एकता की अपेक्षा करना अस्वाभाविक है।
     इसी तरह डॉ आंबेडकर ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को असम्भव कार्य बताते हुए कहा था कि हिन्दू-मुस्लिम एकता की निरर्थकता को प्रगट करने के लिए मैं इन शब्दों से और कोई शब्दावली नहीं रख सकता। अब तक हिन्दू-मुस्लिम एकता कम-से-कम दिखती तो थी, भले ही वह मृग मरीचिका ही क्यों न हो। आज तो न वह दिखती हे, और न ही मन में है। यहाँ तक कि अब तो गाँधी जी ने भी इसकी आशा छोड़ दी है और शायद अब वह समझने लगे हैं कि यह एक असम्भव कार्य है।’
(संदर्भ : डॉ. अंबेडकर सम्पूर्ण वाड्‌मय : ‘पाकिस्तान और भारत के विभाजन)
      इतिहास साक्षी है दलित मुस्लिम एकता का झुनझुना बजाने वाले दलित नेता जोगेंद्र नाथ मंडल को क्यों पाकिस्तान से भाग कर भारत आना पड़ा था। मंडल ने दलितों को बांग्लादेश में रुकने का आवाहन किया था। 1947 के बाद में वह पूर्वी पाकिस्तान में मंत्री भी बने थे। पूर्वी पाकिस्तान मे मण्डल की अहमियत धीरे-धीरे खत्म हो गई। दलित हिंदुओं पर अत्याचार शुरू हो चुके थे । 30% दलित हिन्दू आबादी की जान-माल-इज्जत अब खतरे मे थी। मंडल को अपनी भूल पर पछतावा हुआ। मण्डल ने दुखी होकर जिन्ना को कई पत्र लिखे, उनके कुछ अंश पढ़िये : मंडल ने हिंदुओं के संग होने वाले बरताव के बारे में लिखा, ‘मुस्लिम, हिंदू वकीलों, डॉक्टरों, दुकानदारों और कारोबारियों का बहिष्कार करने लगे, जिसकी वजह से इन लोगों को जीविका की तलाश में पश्चिम बंगाल जाने के लिए मजबूर होना पड़ा.’। गैर-मुस्लिमों के संग नौकरियों में अक्सर भेदभाव होता है. लोग हिंदुओं के साथ खान-पान भी पसंद नहीं करते। पूर्वी बंगाल के हिंदुओं (दलित-सवर्ण सभी) के घरों को आधिकारिक प्रक्रिया पूरा किए बगैर कब्जा कर लिया गया और हिंदू मकान मालिकों को मुस्लिम किरायेदारों ने किराया देना काफी पहले बंद कर दिया था।
     इससे अधिक कुछ कहने की आवश्यकता अब नहीं है। वर्तमान में भी व्यावहारिक रूप से अपने शासन में मुसलमान दलितों के साथ क्या करते है। इसका उदहारण आगे पढ़ेंगे। अगर दलित-मुस्लिम एकता संभव होती तो क्या दलित संत और डॉ अम्बेडकर अपरिपक्व और गलत थे? यह यक्ष प्रश्न इस लेख को पढ़ने वाले सभी दलित भाइयों के लिए हैं।
     1947 के पश्चात पाकिस्तान में बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू दलित अपनी मजबूरी के चलते रुक गए। इन दलितों का सम्बन्ध कॉल, भील और वाल्मीकि जातियों से हैं। पंजाब प्रान्त में रहने वाले वाल्मीकि ईसाई मत स्वीकार कर बड़ी संख्या में उस समय ईसाई बन गए क्योंकि उनके लिए मुस्लिम देश में हिन्दू बने रहना मौत को दावत देने के समान था। जबकि सिंध प्रान्त में रहने वाले कॉल, भील आदि दलित हिन्दू ही बने रहे। पिछले कुछ वर्षों में कट्टर इस्लाम का प्रभाव बढ़ने से गैर-मुस्लिम होने के नाते ईसाई बन चुके दलितों पर पाकिस्तान में अनेक अत्याचार हुआ हैं। उन पर इस्लाम की बेज्जती का, कुरान के पन्ने फाड़ने का और मुहम्मद साहिब की शान में गुस्ताखी करने का आरोप लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया जाता है और उनकी संपति लूट ली जाती हैं।
     यह सब पाकिस्तान के कानून के अन्तर्गत किया जाता हैं। इस पर भी पाकिस्तान के मुसलमानों का मन नहीं भरा तो उन्होंने ईसाई गिरिजाघरों में बम विस्फोट करने आरम्भ कर दिए। बम धमाकों में कई सौ ईसाई दलित मारे जा चुके हैं।
     पूर्वकाल में दलितों हिंदुओं की बेटियों को उठाना, उन्हें जबरदस्ती अपने हरम में बंधक बना लेना। मुस्लिम शासकों के लिए शौक पूरा करने जैसा था। मुसलमानों का यह शोक आज भी सिंध के मुस्लिम जमींदारों और रईसों को हैं। अपने खेतों में बंधवा मजदुर के रूप में दलित हिंदुओं से कार्य लेने वाले मुस्लिम जमींदार उन्हें विप्पति काल में थोड़ा से ऋण दे देते है। जो अनेक बार चुकाने के बाद में भी कभी पूरा नहीं होता। उसके बदले उनसे वे न केवल जीवन भर पीढ़ी दर पीढ़ी मजदूरी करवाते है अपितु उनकी बेटियों पर भी गन्दी नजर रखते है। अभी हाल ही में अनेक अंग्रेजी समाचार पत्रों में छपा हैं कि सुन्दर दिखने वाली दलित हिन्दू लड़कियों को अमीर मुस्लिम जमींदार कर्जमाफी के बदले उठा लेता है। उसे प्रताड़ित कर इस्लाम स्वीकार करा निकाह कर अपने घर में नौकरानी बना कर रखता है। हिन्दू दलितों की सुनवाई करने वाला कोई नहीं होता। इस्लाम की समानता और सहिष्णुता के जमीनी दर्शन अगर दलित चिंतकों को करने हो तो पाकिस्तान के इस्लामिक शासन में जाकर देखे। अक्ल दिखाने आ जाएगी। भारत में जितना दलित-मुस्लिम एकता का झुनझुना बजाते हैं। सब भूल जायेंगे।
     दलित मुस्लिम एकता असंभव हैं। हमारे देश का इतिहास, इस्लाम की मान्यताएं, दलित संतों और सबसे बढ़कर डॉ अम्बेडकर के चिंतन, वर्तमान में पाकिस्तान जैसे देश में दलितों की स्थिति देखकर यह स्पष्ट हो जाता हैं। अब भी दलित हिन्दू नहीं सुधरे तो उनका भविष्य घोर अंधकार का शिकार हो जायेगा। हिंदुओं में पिछली एक शताब्दी में जातिवाद में बहुत कमी आयी हैं। जातिवाद को जड़ से मिटाने के लिए एक सवर्ण और दलित हिंदुओं के संयुक्त प्रयास की आवश्यकता हैं। इसलिए वोटबैंक और जातिवाद की राजनीती करने वाले नेताओं के जूठे वायदों का शिकार मन बने। अपनी बुद्धि का प्रयोग करे।
(साभार : दलित आंदोलन पत्रिका.कॉम में प्रकाशित डॉ विवेक आर्य का आलेख)

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