'मुझे मां गंगा ने बुलाया है' लेकिन अब वही पीएम मोदी मां गंगा को भूल गए हैं

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'मुझे मां गंगा ने बुलाया है' लेकिन अब वही पीएम मोदी मां गंगा को भूल गए हैं

Image may contain: 1 person, text'न मुझे किसी ने भेजा है और न मैं यहां आया हूं, मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है'
    मोक्षदायिनी गंगा को मां बुलाते हैं, लेकिन आज जब सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में बनी मोदी सरकार को 4 साल पूरे हो चुके हैं, तो यह सवाल जायज है कि क्या वास्तव में मां गंगा का कुछ हो पाया है? इन्हीं सवालों का जवाब तलाशने के लिए हमने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में गंगा से जुड़े कुछ विद्वानों और संतों और विशेषज्ञों की राय जानना चाहा और जो कुछ सामने निकल कर आया, वह हैरत में डालने वाला रहा।
      केंद्र की मोदी सरकार के 4 साल में गंगा को लेकर हुए प्रयासों और गंगा की वर्तमान स्थिति को बताते हुए इन 4 सालों में गंगा के वास्तविक स्थिति के बारे में जब खुद केंद्रीय जल आयोग ने स्पष्ट किय, तो यह साफ हो जाता है कि जिस गंगा के नाम पर बीजेपी की नई सरकार सत्ता में काबिज हुई उसने वास्तव में गंगा के लिए कुछ भी नहीं किया। केंद्रीय जल आयोग की मानें, तो वर्तमान में गंगा की स्थिति बहुत ही बुरी हो चुकी है। एक तरफ जहां लगातार गंगा में जल का स्तर गिरता जा रहा है, तो वहीं गंगा में विषैले पदार्थों की मात्रा इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि अब सभी को तारने वाली मां गंगा का जल नहाने और आचमन योग्य भी नहीं रह गया है।
केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों पर अगर गौर करें, तो साफ हो जाएगा कि बीते कुछ सालों में गंगा के न्यूनतम वाटर लेवल में ग्रेजुअली गिरावट देखने को मिल रही है। 2015 में गंगा का न्यूनतम जलस्तर 58.67 मीटर था, जबकि 2016 में इसमें और गिरावट दर्ज हुई और गंगा का जलस्तर 58.52 मीटर रिकॉर्ड किया गया। 2017 में ये घटकर 58.27 मीटर रह गया। जबकि 24 अप्रैल 2018 को वाराणसी में गंगा का जलस्तर आठ सालों के न्यूनतम स्तर पर पहुंचा और वाटर लेवल 58.1 मीटर रिकॉर्ड हुआ, जो 2010 के 57.16 मीटर के बाद न्यूनतम लेवल पर था। ये रिकॉर्ड भी टूट गया और 25 मई 2018 तक सेंट्रल वाटर कमीशन ने गंगा का जलस्तर बनारस में 57.84 मीटर रिकॉर्ड किया, जो मई महीने में पिछले साल 2017 में 58.33 मीटर दर्ज किया गया था, जो ये साफ कर रहा है कि गंगा लगातार सूख रही है।
      यह तो हो गई गंगा के सूखने की बात और गंगा में कम हो रहे पानी के हालात, लेकिन इससे भी बड़ी और गंभीर समस्या है गंगा के जल का लगातार प्रदूषित होना। हाल यह है कि जिस गंगाजल में मौजूद प्राकृतिक तत्वों की वजह से उसे सबसे शुद्ध और साफ कहा जाता था, वह जल आज नहाने और आचमन के लायक भी नहीं रह गया है। यह भी हम नहीं बल्कि खुद सेंट्रल वाटर कमीशन के आंकड़े बयां कर रहे हैं।
     गंगा पर रिसर्च करने वाले संकट मोचन फाउंडेशन के निदेशक प्रोफेसर विशंभर नाथ मिश्र का कहना है कि अपस्ट्रीम के आलावा डाउनस्ट्रीम खिड़कियां नाला और वरुणा के आसपास कोई भी जलचर गंगा में जिंदा नहीं रह सकता है। इसकी बड़ी वजह यह है कि डीओबी प्रति लीटर क्रमशः 1, 2 व जीरो है, जबकि सामान्य तौर पर इसकी संख्या 5 या उससे अधिक होनी चाहिए। फिकल कोलीफार्म की बात करें तो इसमें भी आंकड़े काफी भयावह हैं, जिसकी वजह से गंगा में ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जा रही है जो जलीय जीवों के साथ इंसानों के लिए भी खतरा है।
     गंगा की वर्तमान स्थिति के बारे में गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई के इंजीनियर रविंद्र सिंह का कहना है कि लगातार गंगा का जल स्तर गिरता ही जा रहा है और गंगा में पॉल्यूशन का लेवल तेजी से बढ़ रहा है, जो चिंता की बात है। रविंद्र सिंह का कहना है कि गंगा के हालात में सुधार नहीं हुआ और लगातार जलस्तर में घटाव जारी है। वर्तमान में गंगा में असली पानी की जगह सीवेज की मात्रा ज्यादा है। इसकी वजह से गंगा में टोटल कोलीफार्म और फिकल कोलीफॉर्म तेजी से बढ़ रहा है, जो यह इंडीकेट करता है कि अब गंगा का पानी नहाने और पीने दोनों के योग्य नहीं रह गया है।
     वहीं गंगा की वर्तमान स्थिति के बारे में बीएचयू के प्रोफेसर और गंगा बेसिन अथॉरिटी के सदस्य रह चुके प्रो बीडी त्रिपाठी ने बताया कि गंगा को लेकर शासन व प्रशासन स्तर पर किए जा रहे दावे सिर्फ और सिर्फ हवा-हवाई हैं। क्योंकि बनारस में इन 4 सालों में धरातल स्तर पर कुछ भी ऐसा प्रयास नहीं हुआ, जिसके बाद यह कहा जा सके कि गंगा निर्मल और स्वच्छ हो रही है। प्रोफेसर त्रिपाठी का कहना है कि आज गंगा के लिए प्रदूषण से बड़ा खतरा तेजी से गंगा में कम हो रहा पानी है, क्योंकि उत्तराखंड समेत अलग-अलग हिस्सों में गंगा पर बने बांधों ने गंगा में पानी का स्तर कम कर दिया है। इसकी वजह से गंगा की धारा टूट रही है और बीच-बीच में रेत के टीले देखने के अलावा घाटों से गंगा का संपर्क टूटता जा रहा है, जो अपने आप में चिंता की बात है।
    प्रोफेसर बीडी त्रिपाठी का कहना है कि गंगा के हालात को सुधारने के लिए जमीनी स्तर पर अब तक कुछ भी नहीं हुआ है, जिससे वाराणसी या फिर अन्य किसी शहर में गंगा की स्थिति सुधरे। प्रोफेसर त्रिपाठी का कहना है कि यहां गंगा में गिरने वाले सीवर के ट्रीटमेंट के लिए मात्र 102 एमएलडी क्षमता वाले तीन एसटीपी काम कर रहे हैं, जबकि वाराणसी में प्रतिदिन 350 एमएलडी सीवरेज गंगा में सीधे गिर रहा है। उनका कहना है कि 350 एमएलडी में 75 एमएलडी औद्योगिक इकाइयों का प्रदूषित जल है, जिसे रोकना बहुत ही जरूरी है।
     गंगा स्वच्छता के लिए बनारस में दीनापुर में संचालित हो रहा 80 एमएलडी, भगवानपुर में संचालित हो रहा 12 एमएलडी और डीएलडब्ल्यू में चल रहा 10 एमएलडी का एसटीपी प्लांट ही वर्क कर रहा है। इन तीनों प्लांट की कुल क्षमता 102 एमएलडी है जो सीवरेज का ट्रीटमेंट कर पा रही है यानि गंगा में गिर रहे 350 एमएलडी सीवरेज के सापेक्ष सिर्फ 102 एमएलडी सीवरेज का ही ट्रीटमेंट हो रहा है जबकि शेष 248 एमएलडी सीवर गंगा में सीधे जा रहा है और इसकी स्वच्छता और निर्मलता को पूरी तरह से बर्बाद कर रहा है।
     प्रोफेसर त्रिपाठी की मानें, तो गंगा में नालों के गिरने को लेकर दावे सिर्फ और सिर्फ कागजी हैं। क्योंकि सीधे 33 बड़े और कई छोटे नाले गंगा में हर रोज प्रदूषण का स्तर बढ़ा रहे हैं। इसमें नारायण घाट, जलासेन घाट, त्रिलोचन घाट, शिवाला, नगवा, राजेंद्र प्रसाद घाट, मणिकर्णिका, निषाद राज घाट, पांडेघाट समेत आधा दर्जन से ज्यादा और ऐसे घाट हैं जहां से सीधे गंगा में सीवरेज को गिराया जा रहा है। जिसकी वजह से गंगा का जल जहरीला होता जा रहा है।
    केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद गंगा मंत्रालय के अधीन शुरू किए गए नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत बनारस में क्या हुआ और कब हुआ यह सवाल भी हर किसी के मन में उठता रहा है? लेकिन सच्चाई तो यह है कि नमामि गंगे के तहत बनारस को कुछ भी ऐसा नहीं मिला, जिसके बाद यह कहा जा सके कि गंगा साफ हो रही है। इस बारे में अधिकारियों का कहना है कि नमामि गंगे योजना के तहत बनारस में कुछ काम जो शुरू हो चुके हैं उनमें 10 करोड़ 32 लाख रुपए की लागत से 26 घाटों के मरम्मत का काम, इसके अलावा जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी जेएससीए की मदद से चल रही परियोजना के तहत 140 एमएलडी एसटीपी दीनापुर में 50 एमएलडी एसटीपी संयंत्र रमना में स्थापित किया जा रहा है। यह परियोजना निर्माण के अंतिम चरण में है और जून 2018 मार्च 2019 तक दोनों की पूरा होने की उम्मीद है।
    इस बारे गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई के इंजीनियर रविन्द्र सिंह का कहना है कि नमामि गंगे योजना के तहत बनारस में गंगा में सीधे गिर रहे नालों को रोकने के लिए वर्तमान में रमना में 156 करोड़ रुपये की लागत से 50 एमएलडी के एक एसटीपी का निर्माण कार्य जारी है। इसके अलावा जायका के सहयोग से दीनापुर में 170 करोड़ की लागत से 140 एमएलडी का एक अन्य एसटीपी निर्माण की प्रक्रिया में है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह दोनों प्रोजेक्ट यूपीए-2 के शासनकाल में शुरू हुए थे उस वक्त इन दोनों प्रोजेक्ट को मिनिस्ट्री फ़ॉर इंवॉरमेंट एन्ड फारेस्ट में था जिसको मोदी सरकार ने आने के बाद मिनिस्ट्री फ़ॉर वाटर एन्ड रिसोर्स में शिफ्ट कर दिया। इंजीनियर ने बताया कि नमामि गंगे में रमना एसटीपी 50 एमएलडी ही पास हुआ है। इन दोनों प्रोजेक्ट का कार्य जारी है और दीनापुर में 140 एमएलडी एसटीपी को जून 2018 तक पूरा कर लिया जाएगा, जबकि रमना में बन रहे 50 एमएलडी एसटीपी को मार्च 2019 तक पूरा किया जा सकेगा। जिसके बाद गंगा में हर रोज गिर रहे 375 एमएलडी सीवरेज को ट्रीट करने के लिए पर्याप्त संयंत्र मौजूद होंगे।
    इसके अलावा घाटों की साफ-सफाई से लेकर घरों की मरम्मत और रखरखाव के लिए भी नमामि गंगे योजना के तहत बनारस के 26 घाटों में काम जारी है। इस बारे में नगर आयुक्त डॉ नितिन बंसल का कहना है कि नमामि गंगे योजना के तहत वाराणसी में 80 घाटों की सफाई के लिए एक प्राइवेट कंपनी आईएलएफएस घाटों की साफ सफाई का जिम्मा उठाए हुई है। इस कंपनी को नमामि गंगे योजना के तहत भुगतान किया जाता है, जबकि जनवरी 2018 में नमामि गंगे योजना के तहत कुल 26 घाटों की मरम्मत के लिए 10 करोड रुपये का बजट जारी कर दिया गया है और काम जारी है।
    वही मोदी सरकार के 4 साल के बाद भी गंगा की वर्तमान स्थिति में सुधार ना होने से संत समाज खासा नाराज है। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती प्रधानमंत्री मोदी के डायलॉग को गब्बर सिंह का डायलॉग बता रहे हैं, जो उन्होंने बनारस में अपने नॉमिनेशन के दौरान कहा था। स्वामी अविमुक्‍तेश्‍वरानदं का कहना है कि जब पीएम मोदी बनारस आए तो उन्होंने कहा था कि 'मुझे मां गंगा ने बुलाया है' लेकिन अब वही पीएम मोदी मां गंगा को भूल गए हैं।

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