पृथ्वीराज चौहान की अस्थियों को अपने दम पर अफ़ग़ानिस्तान से भारत कौन लाया?

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पृथ्वीराज चौहान की अस्थियों को अपने दम पर अफ़ग़ानिस्तान से भारत कौन लाया?

   राजपूतों में जन्म लिया एक ऐसा वीर योद्धा जिसके बारें में शायद आप अभी तक अनजान होंगे। शेर सिंह राणा (पंकज पुंडीर) का जन्म 17 मई 1976, उत्तराखंड के रुड़की में हुआ था। आपको बता दे राणा ने अंतिम हिंदू सम्राट कहे जाने वाले पृथ्वीराज चौहान की अफगानिस्तान के गजनी इलाके में रखी हुई अस्थियों को वे ही भारत ले कर आये है।  
फूलन देवी की हत्या में गए जेल 
   राणा को जब पता चला की कुछ साहूकारो के शोषण का शिकार हुई फूलन देवी ने बेवजह कई राजपूतों को धोखे से हत्या कर दी तब शेर सिंह राणा ने भी राजपूतों के बेवजह हुए हत्याकांड का बदला लेने के लिए फूलन देवी की हत्या की। इस हत्या की वजह से राणा को पुलिस ने तिहाड़ जेल में बंद कर दिया था।
पृथ्वीराज चौहान की अस्थियां भारत लाये 
   जेल बाहर आने के बाद एक इंटरव्यू में शेर सिंह ने बताया कि जब वें फूलन देवी हत्या के आरोप में सजा काट रहे थे तभी वे भारत के सबसे नामी तिहाड़ जेल से 17 फरवरी 2004 को वे फरार हो गए।
   राणा ने नेपाल, बांग्लादेश, और दुबई के रास्ते होते हुए अफगानिस्तान पहुंचे। जहां पर उन्होंने अपनी जान को जोखिम में डाल कर अफगानिस्तान के गजनी से हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान की रखी हुई अस्थियां 2005 में भारत ले आए।
   इस पूरी घटना का बाकायदा राणा ने वीडियो भी बनाया। इसके बाद राणा ने अपनी मां की मदद से गाजियाबाद के पिलखुआ में पृथ्वीराज चौहान का मंदिर बनवाया, जहां पर उनकी अस्थियां आज भी रखी हुई है।
पृथ्वीराज चौहान की समाधी के साथ क्या कुछ हुआ था 
    भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट वीर शिरोमणि पृथ्वीराज चौहान की वीर गाथाएं तो हमारे सम्रद्ध इतिहास में शुरू से पढ़ी और सुनी जा रही हैं लेकिन उनसे जुड़ा एक और असली सच उस समय सामने आया जब आतंकियों द्वारा भारत का हवाई जहाज हाई जैक कर कंधार ले जाया गया। उसे वापिस लाने के लिए तत्कालीन विदेशमंत्री जसवंत सिंह वहा गये और लोट कर उन्होंने जिस हकीकत से पर्दा उठाया उसने समस्त देशवासियों का मन झकझोर कर रख दिया बकौल जसवंत सिंह अफगानिस्तान में आज भी पृथ्वीराज चौहान की समाधी स्थित है जिस पर वहा के नागरिक जुते - चप्पल मारकर न सिर्फ उस वीर शिरोमणि का अपमान करते हैं बल्कि समूचे भारत व भारत के गोरवशाली इतिहास को बेज्जत करते हैं। 
जेल से भागने का प्लान क्यों बनाया
    जसवंत सिंह के इस बयान को समूचे भारतीय मीडिया ने बड़ चड़ कर देश की जनता के सामने रखा। फिर क्या नेता या आम आदमी सभी ने पृथ्वीराज चौहान की अस्थियाँ वापस लाने की वकालत तो की पर प्रयास करने की जहमत शायद किसी ने नहीं उठाई। यही खबर टेलीविजन पर शेर सिंह राणा ने देखी जो फूलन देवी (पूर्व डाकुनी) की हत्या के आरोप मैं तिहाड़ जेल में था। खबर सुनते ही शेर सिंह राणा के दिल में राष्ट्र सम्मान वापस लाने की बेचेनी बड गयी। कई दिन तक इसी उदेहबुन में रहे की किस तरह वीर शिरोमणि पृथ्वीराज चौहान की अस्थिया वापस हिंदुस्तान लाई जा सकती हैं और जब उन्हें कुछ नहीं सुझा तो उन्होंने जेल से भागने का फैसला कर लिया। 
    शेर सिंह राणा के मन में विचार चल ही रहे थे की एक दिन एक पुलिस कर्मी ने उनसे पूछ ही लिया की आखिर क्या बात है परेशान से नज़र आ रहे हो। राणा ने अपने दिल की बात उन पुलिस कर्मियों से कह डाली की मै किसी भी तरह पृथ्वीराज चौहान की अस्थियाँ वापस हिन्दुतान लाना चाहता हूँ। इस पर पुलिस वाले राणा का मजाक उड़ने लगे की पहले तो तू फूलन की हत्या के आरोप से ही नहीं बच पायेगा और किसी भी तरह बच भी गया तो समय इतना गुजर जाएगा की तेरे बस में कुछ नहीं रहेगा। फिर ८०० साल से एसा नहीं हो पाया तो तेरी क्या बिसात है। 
    बस पुलिस कर्मियों के यही शब्द सुन कर शेर सिंह राणा का फैसला और भी अडिग हो गया और 2003 के अंतिम माह में शेर सिंह राणा ने तिहाड़ जेल से बाहर आने का खाका बनाना शुरू कर दिया और उसके बाद शेर सिंह राणा ने अपने भाई विक्रम सिंह राणा को पूरी योजना समझाई। विक्रम ने पूरी दिल से अपने भाई की भावनाए समझी और हर स्तर पर साथ देने का भरोसा दिया। 
जेल से भागने के लिए क्या कुछ किया 
    योजना के अनुसार पुलिस वन जैसी एक बड़ी गाडी एक हथकड़ी कुछ पुलिस की वर्दी और कुछ विश्वास वाले लड़कों की जरूरत थी। विक्रम ने सबसे पहले इस योजना में रूडकी के संदीप ठाकुर को जोड़ा। संदीप ठाकुर तिहाड़ में शेर सिंह राणा से मिला और पूरी योजना को समझाया। शेर सिंह राणा से मिलने के लिए संदीप ठाकुर नकली वकील बना और उसी लिबास में अक्सर तिहाड़ जाता था ताकि जेल का सिस्टम समझ सके और आने जाने का खोफ भी दूर हो सके। शेर सिंह संदीप को जेल की हर गतिविधि से अवगत करता ताकि संदीप अपनी योजना को फुलप्रूफ निभा सके। इस दोरान विक्रम ने तीन लड़के और योजना में जोड़ लिए और उनको उनका काम समझा दिया। 
    17 फरवरी 2003 को शेर सिंह राणा जेल नंबर एक मैं हाई रिक्स वार्ड मैं था। सुबह 6 बजे हवालदार ने बताया की तुम्हारी कोर्ट की तारीख है 6. 30 पर तुम को जेल की ड्योढ़ी में आना हैं, योजना के अनुसार शेर सिंह राणा पहले से ही तैयार था। उस दोरान शेर सिंह राणा का एक और साथी शेखर सिंह जो फूलन के हत्या के आरोप जेल में ही था, से उसने कहा की भाई आज अगर सायरन बजे तो समझ लेना की शेर सिंह राणा तिहाड़ जेल से भाग गया है। आगे हनुमान जी मेरी रक्षा करेंगे ठीक 6:30 पर शेर सिंह राणा जेल की ड्योडी में हवालदार के साथ पहुंचा तभी संदीप ठाकुर पुलिस की वर्दी में अन्दर आ गया। 
   योजना अनुसार संदीप ने नकली वारंट जेल अधिकारीयों को दिखा कर हथकड़ी पहना दी और गेट पर ले आया। गेट पर खड़ी नकली पुलिस वैन में शेर सिंह राणा बैठ रफुचकर हो गये। एक घंटे के बाद असली पुलिस के पहुचने पर पता चला की शेर सिंह राणा जेल से निकल गया है। 
  आनन् फानन में सायरन बजाया गया सारे जेल में तहलका मच गया पर तब तक शेर सिंह राणा जेल की हद से बहुत दूर निकल गया था।
राणा ने जेल से भागने के बाद क्या कुछ किया 
   जेल से भागने के बाद शेर सिंह राणा ने अपने भाई से संपर्क किया और कुछ रूपये मंगाए और रांची पहुँच गया।  वहा संजय गुप्ता के नाम से पासपोर्ट बनवाया और बंगला देश निकल गये। कुछ क्षत्रिय नेताओं से संपर्क साधा और जेल से भागने के पीछे उन्होंने पृथ्वीराज चौहान की समाधी वापस हिंदुस्तान लाना बताया। इस पर क्षत्रिय नेताओं ने उन्हें पूरा साथ देने का भरोसा दिया। उस दोरान अफगानिस्तान के लिए सिर्फ दिल्ली पाकिस्तान और दुबई से ही जाया जा सकता था। 
    चूँकि दिल्ली पुलिस शेर सिंह राणा के पीछे थी इसलिए उन्होंने पाकिस्तान से जाने का प्रयास किया। लेकिन पाकिस्तान शेर सिंह राणा सच्चे हिन्दुस्तानी सपूत के कंधे पर बन्दुक रख के भारत पर वार करना चाहता था लेकिन पाकिस्तान ये भूल रहा था की कौन ऐसा व्यक्ति है जो अपने राष्ट्र का सम्मान वापस लाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल सकता है उसे भला पाकिस्तान कैसे बरगला सकता है?
    दिसम्बर 2004 को शेर सिंह राणा ने अफगानिस्तान जाने का रास्ता वाया दुबई चुना। शेर सिंह राणा पहले दुबई गया। वहां से काबुल, काबुल से कंधार और कंधार से हेरात पहुंचा। हेरात से वापस कंधार और कंधार से गजनी। इस तरह तालिबानियों के गड़ में शेर सिंह राणा ने एक माह गुजारा और पृथ्वीराज चौहान की समाधी को खोजते रहे। इस दोरान शेर सिंह राणा की कुछ खास लोगो से मुलाकात हुई और उनके माध्यम से गजनी में पृथ्वीराज चौहान के समाधी तक पहुचने में सफलता मिली।
पृथ्वीराज चौहान की समाधी कहा मिली 
    पृथ्वीराज चौहान साहब की समाधी गजनी में सुल्तान मोहमद गोरी से करीब बीस किलोमीटर दूर देयक गाँव में हैं। शेर सिंह राणा ने देयक गाँव जाकर अपनी तसल्ली की और वहां पृथ्वीराज चौहान का अपमान अपनी आँखों से देखा और अपने कैमरे में कैद किया। वहां दो महीने के अथक प्रयास के बाद शेर सिंह राणा का मकसद पूरा हुआ। अंततः वे उनकी समाधी को हिन्दुतान लाये और क्षत्रिय सभा को सोंप दिया और अपने सच्चे हिन्दुस्तानी होने का सबूत दिया। 
    क्षत्रिय सभा ने बेवर कानपूर हाई वे के बीच में एक महासमेलन कर के शेर सिंह राणा की माता सत्यवती राणा के कर कमलो द्वारा वीर शिरोमणि पृथ्वीराज चौहान की समाधी की स्थापना कराई। 
राणा द्वारा कानून का सम्मान और आत्मसमर्पण 
    दूसरी और शेर सिंह राणा ने कानून का सम्मान कर मकसद पूरा होने पर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और उन्हें वहां से सीधा तीसहजारी कोर्ट में लाया गया। कुलदीप तोमर और कई राजपूतों की अगवाई में शेर सिंह राणा को जब कोर्ट में पेश किया गया तो कोर्ट शेर सिंह राणा के नारों से गूंज गया। पुरे कोर्ट परिसर में राणा की एक झलक पाने को सभी बेकरार थे तब कुलदीप तोमर और सत्यवती राणा जी कोर्ट में गई और शेर सिंह राणा के गले लगी और रोने लगी। 
    माँ के गले लग कर वीर शेर सिंह राणा के आँखों में आंसू आ गये, पर देश प्रेम का जज्बा भी था तो माँ ने शाबासी दी। शेर सिंह राणा को कोर्ट ने लाल कपडे, हथकड़ी और पेरों में भी जंजीरे बाँधने के आर्डर दिए गए लेकिन कोर्ट द्वारा उनकी माता जी के निवेदन पर जंजीरो का आर्डर वापस ले लिया गया और शेर सिंह राणा को खतरनाक कैदी घोषित किया गया और हमेशा उन्हें लाल रंग के कपडे पहने के लिए आर्डर दिए गए थे।

(कुलदीप सिंह तोमर) 

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