मुंबई की चॉल से लेकर बड़े पर्दे के सफर तक: जानिए 'दृश्यम' के खूंखार 'गायतोंडे' यानी कमलेश सावंत की अनकही कहानी
बॉलीवुड और मराठी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी दमदार अदाकारी से खास पहचान बनाने वाले अभिनेता कमलेश सावंत आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।
रिजेक्शन्स और संघर्ष से भरा लंबा दौर
कमलेश सावंत ने साल 2004 में आई फिल्म 'खाकी' से अपने अभिनय सफर की शुरुआत की थी। इसके बाद उन्हें लंबे समय तक कड़ा संघर्ष करना पड़ा।
जब लोग सचमुच करने लगे नफरत: 'गायतोंडे' का खौफ
कमलेश सावंत के करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुई निशिकांत कामत के निर्देशन में बनी फिल्म 'दृश्यम'।
एक इंटरव्यू में खुद कमलेश ने खुलासा किया था कि फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद कुछ महिला दर्शक उनसे इतनी खफा हो गई थीं कि उन्होंने गुस्से में यहाँ तक कह दिया था— "I want to spit on your face (आपके मुंह पर थूकना चाहती हूँ)" और कुछ ने कहा कि "जी करता है आपको चप्पलों से मारूँ, लेकिन काम बहुत अच्छा किया है!"
सादगी और कड़वी सच्चाई
पर्दे पर भले ही कमलेश सावंत का खौफनाक रूप देखने को मिलता है, लेकिन असल जिंदगी में वह बेहद सरल स्वभाव के हैं। हाल ही में उन्होंने एक इंटरव्यू में यह भी साझा किया था कि अपने सीधे और सरल स्वभाव के कारण उन्हें कई बार फिल्म इंडस्ट्री में वित्तीय नुकसान भी झेलना पड़ा और उनके लगभग 70 लाख रुपये तक डूब गए, लेकिन उन्होंने कभी काम के प्रति अपनी निष्ठा कम नहीं होने दी।
आज मुंबई की चाल से उठकर अपनी मेहनत के दम पर हिंदी और मराठी सिनेमा में एक अमिट छाप छोड़ने वाले कमलेश सावंत यह साबित करते हैं कि यदि लगन सच्ची हो, तो एक दिन सफलता जरूर मिलती है।
कमलेश सावंत (Kamlesh Sawant) का शुरुआती जीवन, उनके थिएटर के दिन और व्यक्तिगत संघर्ष काफी उतार-चढ़ाव और संघर्षों से भरे रहे हैं। उनके इस सफर के मुख्य पहलू निम्नलिखित हैं:
मुंबई की चॉल और कलाचौकी के शुरुआती दिन:
कमलेश सावंत का जन्म और शुरुआती जीवन मुंबई के एक साधारण माहौल में बीता। वह मूल रूप से मुंबई के कलाचौकी (Kala Chowki) इलाके से ताल्लुक रखते हैं और उन्होंने अपने शुरुआती दिन एक चॉल में बिताए। बचपन और शुरुआती दौर में उन्होंने काफी तंगी देखी थी, और कई बार वे पैसे बचाने के लिए बेहद साधारण जीवन जीते थे (जैसे मात्र पाँच रुपये में 'सोल्जर-कट' बाल कटवाना)। थिएटर और मिमिक्री से शुरुआत:
अभिनय के प्रति अपने जुनून के कारण उन्होंने मराठी थिएटर से अपने करियर की शुरुआत की। थिएटर में कदम रखने के बाद उन्होंने लंबे समय तक मिमिक्री करने, स्टेज पर छोटे-मोटे रोल निभाने और नाटकों के लिए कड़ी मेहनत करने में लंबा समय बिताया। अपने थिएटर गुरुओं के मार्गदर्शन में उन्होंने अभिनय की बारीकियों के साथ-साथ रंगमंच की तकनीकी बारीकियों को भी बहुत करीब से सीखा। लंबा संघर्ष और अनिश्चितता: फिल्मों में बड़ा ब्रेक मिलने से पहले उन्हें लगभग दो दशकों तक कड़ा संघर्ष करना पड़ा।
साल 2004 में फिल्म 'खाकी' से हिंदी सिनेमा में पदार्पण करने के बाद भी उन्हें तुरंत स्टारडम नहीं मिला। इसके बाद के एक दशक से अधिक समय तक उन्हें लगातार रिजेक्शन्स का सामना करना पड़ा। बड़े प्रोजेक्ट्स में केवल छोटे-मोटे और साइड रोल ही उनके हिस्से आए, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। वित्तीय नुकसान और धोखाधड़ी: अपने सीधे और सरल स्वभाव के कारण उन्हें निजी जीवन और करियर के मोर्चे पर कई बार आर्थिक मार झेलनी पड़ी। एक इंटरव्यू में उन्होंने खुलासा किया था कि फिल्म इंडस्ट्री में काम करते-करते कई लोगों और प्रोजेक्ट्स के चलते उनके लाखों रुपये (लगभग 70 लाख रुपये तक) डूब गए थे, जिससे उन्हें मानसिक और वित्तीय रूप से भारी संकट का सामना करना पड़ा था।
जीवनसाथी का साथ: उनके इस कठिन दौर और आर्थिक उतार-चढ़ाव के बीच उनकी पत्नी (सपना सावंत) ने उनका बहुत साथ दिया। कमलेश सावंत खुद स्वीकार करते हैं कि उनके जीवन में वित्तीय और व्यावसायिक मामलों को उनकी पत्नी ने संभालना शुरू किया, जिसके बाद उनके जीवन में स्थिरता आई और वे पूरी तरह से अपने अभिनय पर ध्यान केंद्रित कर पाए।
थिएटर की इसी कड़ी मेहनत, अनुशासन और कभी न हार मानने वाले जज्बे ने अंततः उन्हें 'दृश्यम' जैसी फिल्मों में 'गायतोंडे' जैसे आइकॉनिक किरदार को जीवंत करने की क्षमता दी।

