मुगल सल्तनत के अंतिम शासक अंतिम बादशाह बहादुर शाह जफर के परपोते मिर्जा बेदार बख्त की पत्नी सुलताना बेगम (जिन्हें कई जगह रजिया सुल्ताना भी कहा जाता है) हावड़ा (पश्चिम बंगाल) की एक तंग बस्ती में बेहद गुरबत की जिंदगी बिता रही हैं। 1980 में उनके पति के निधन के बाद से वे कड़े संघर्षों के बीच अपना जीवन यापन कर रही हैं।
लाल किले के हुक्मरानों की बहु आज किराए के एक कमरे में: मुगल वंश की आखिरी वारिस सुल्ताना बेगम की दास्तान
हावड़ा/कोलकाता। कभी जिस मुगल सल्तनत का सिक्का पूरे हिंदुस्तान पर चलता था और जिसका मरकज दिल्ली का ऐतिहासिक लाल किला हुआ करता था, उसी शाही खानदान की एक बहू आज हावड़ा की एक संकरी और सीलन भरी गली के किराए के छोटे से कमरे में गुमनामी और कड़े अभावों के बीच सांसें गिन रही है। यह दास्तान है अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के परपोते मिर्जा बेदार बख्त की बेवा सुलताना बेगम की।
12 साल की उम्र में शाही खून से हुआ निकाह
सुलताना बेगम के मुताबिक, 15 अगस्त 1965 को महज 12 साल की उम्र में उनका निकाह मिर्जा बेदार बख्त से हुआ था। उस वक्त बेदार बख्त के पास कोई स्थायी रोजगार नहीं था; उन्हें सरकार की ओर से मामूली पेंशन (करीब 250 रुपये) मिलती थी। शाही खानदान की विरासत के नाम पर कुछ यादें और पुरानी तस्वीरें जरूर थीं, लेकिन पेट भरने के लिए रोजाना की जद्दोजहद बनी रहती थी।
मजदूरी करके बच्चों को पाला
निकाह के बाद जब परिवार बढ़ा, तो घर चलाना और मुश्किल हो गया। पति की बीमारी और फिर 1980 में उनके इंतकाल के बाद सुल्ताना बेगम पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। स्वाभिमानी सुल्ताना ने किसी के आगे हाथ फैलाने की बजाय मेहनत-मजदूरी का रास्ता चुना। उन्होंने परिवार का पेट पालने के लिए:
किताबों की जिल्दसाजी (Book binding) की।
लाख की चूड़ियां बनाईं और पेन के सॉकेट लगाने का काम किया।
कपड़ों की सिलाई, मोती पिरोने और चाय की छोटी दुकान तक चलाई।
कठिन दिनों को याद करते हुए वे बताती हैं कि कई बार ऐसा वक्त भी आया जब बच्चों को पानी में ब्रेड डुबोकर खिलानी पड़ी, लेकिन उन्होंने अपना आत्मसम्मान कभी झुकने नहीं दिया।
'अपने ही लाल किले में टिकट लेकर जाती हूं'
आज सुल्ताना बेगम को सरकार से जो मामूली पेंशन मिलती है, उसका बड़ा हिस्सा मकान के किराए में ही चला जाता है। उनका सबसे बड़ा दर्द यह है कि जिस लाल किले से उनके बुजुर्गों ने मुल्क पर हुकूमत की, आज उसी लाल किले को देखने के लिए उन्हें आम पर्यटकों की तरह कतार में लगकर टिकट खरीदना पड़ता है।
सरकार से अंतिम गुजारिश
जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर खड़ी सुल्ताना बेगम को न तो शाही ठाठ-बाठ की चाहत है और न ही किसी बड़ी रियासत की। उनकी बस इतनी सी मांग है कि सरकार बहादुर शाह जफर के परिवार की कुर्बानियों और इतिहास का सम्मान करे।
"न हमारे पास कोई जायदाद है, न कोई शाही खजाना। मेरी बस इतनी सी ख्वाहिश है कि जिंदगी के बचे हुए दिनों में सिर छुपाने के लिए एक अदद अपना ठिकाना मिल जाए।"
— सुलताना बेगम

