विशेष संपादकीय: 'गांधीछाप' का यह अनादर और हमारी खोखली आस्था
गांधी जयंती के पावन अवसर पर जहां पूरा देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और सादगी के आदर्शों को याद करने का ढोंग रचाता है, वहीं दूसरी ओर हमारे समाज की कड़वी सच्चाई सड़कों पर बिखरी नजर आती है। शादियों, जुलूसों और मांगलिक अवसरों पर धन और वैभव का दिखावा (पाखंड) करने के लिए नकली नोटों की बारिश करना एक आम चलन बन चुका है।
दिखावे की इस अंधी दौड़ में जब ये नकली नोट उछालने के बाद सड़कों, नालियों और कचरे के ढेरों में तब्दील होते हैं, तो उन पर छपी महात्मा गांधी की तस्वीर राहगीरों के पैरों तले और गाड़ियों के टायरों के नीचे कुचली जाती है। अहिंसा के अवतार और विश्वभर में शांति के प्रतीक बापू के चित्र का यह दैनिक अनादर हमारी सामाजिक चेतना पर एक करारा तमाचा है।
व्यंग्य का मर्म: असली भक्ति या 'गांधीछाप' का मोह?
डॉ. दीपक आचार्य के तीखे व्यंग्य बाण समाज और राजनीति, दोनों की नब्ज पर चोट करते हैं:
राजनीतिक उपयोगिता और सरनेम की महिमा: दशकों से 'गांधी' नाम और उनकी टोपी का इस्तेमाल केवल सत्ता हासिल करने और वोटों का कटोरा फैलाने के लिए किया गया। गांधी टोपी अब वैचारिक सादगी का प्रतीक न रहकर केवल राजनीतिक लाभ का साधन बन चुकी है।
क्रांतिकारियों से दूरी और तटस्थता: महात्मा गांधी की बैरिस्टरी, उनके 'सत्य के प्रयोग' और भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों के मामलों में उनकी 'तटस्थता' पर भी व्यंग्यात्मक ढंग से कटाक्ष किया गया है, जो आज के कथित गांधीवादियों की विचारशून्य वफादारी को उजागर करता है।
'गांधी छाप' ही असली प्राणवायु: आज का कड़वा सच यह है कि आदर्शों वाले गांधी को तो समाज ने भुला दिया है, लेकिन कागजी नोट वाले 'गांधी छाप' को सबने अपने घरों में 'प्राणवायु' की तरह जमा (संग्रह) करके रखा है।
प्राइम न्यूज राजस्थान की अपील
उत्साह और खुशी जाहिर करने के नाम पर नकली नोट उछालने और सड़कों को दूषित करने की इस कुप्रथा पर तुरंत रोक लगानी चाहिए। यदि हम बापू के विचारों को अपने जीवन में नहीं उतार सकते, तो कम से कम उनके चित्र का इस तरह अपमान करने से तो बचें।
"गांधी हमारी जीवन पद्धति हों या न हों, लेकिन 'गांधी छाप' हमारी सांसों में बस चुका है। जब तक सूरज-चांद रहेगा, बापू का नाम और उनके आदर्शों का सम्मान अक्षुण्ण रहना चाहिए।"
लेखक: डॉ. दीपक आचार्य

