पोलियो भी नहीं तोड़ सका जज्बा, अकेले दम पर वेम्बनाड झील को कचरा-मुक्त बना रहे हैं N.S. Rajappan

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मजबूत इरादों की मिसाल: दोनों पैरों से लाचार, फिर भी अकेले ही केरल की वेम्बनाड झील को कचरा-मुक्त कर रहे हैं एन.एस. राजप्पन

कोट्टायम (केरल): जहाँ एक तरफ प्लास्टिक प्रदूषण पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है, वहीं दूसरी तरफ केरल के कोट्टायम जिले के 70 से अधिक उम्र के बुजुर्ग एन.एस. राजप्पन ने साबित कर दिया है कि अगर मन में कुछ करने का जज्बा हो, तो शारीरिक कमियां भी आपके रास्ते में रोड़ा नहीं बन सकतीं।

जज्बे को सलाम: न चलने की ताकत, न कमाने की होड़... फिर भी केरल की झील को नया जीवन दे रहे हैं 70 वर्षीय राजप्पन
राजप्पन जी बचपन में ही पोलियो की वजह से पैरों से लाचार हो गए थे और चलने-फिरने में असमर्थ हैं। लेकिन इसके बावजूद वे रोजाना सुबह तड़के अपनी छोटी सी देशी नाव (Country Boat) लेकर वेम्बनाड झील और उससे जुड़ी नहरों में निकल पड़ते हैं। उनका काम पानी में तैरती हुई प्लास्टिक की बोतलें और कचरा इकट्ठा करना है।

केरल के कोट्टायम जिले में रहने वाले एन.एस. राजप्पन (N.S. Rajappan) पिछले कई सालों से वेम्बनाड झील (Vembanad Lake) और कुमराकोम की जलधाराओं से प्लास्टिक की नावें और बोतलें साफ कर रहे हैं। बचपन में पोलियो के कारण उनके दोनों पैर काम नहीं करते हैं, लेकिन उनकी यह शारीरिक चुनौती पर्यावरण सुरक्षा के उनके जज्बे को नहीं रोक सकी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में राजप्पन जी के इस निस्वार्थ प्रयास की सराहना की थी और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के पूर्व प्रमुख एरिक सोल्हेम ने भी उनका वीडियो शेयर कर उनकी तारीफ की थी।

महज कुछ रुपयों की कमाई, पर मकसद बड़ा

राजप्पन जी रोजाना कई घंटों की कड़ी मेहनत से नाव भरकर प्लास्टिक की बोतलें चुनते हैं। इसे सुखाकर और कट्टों में भरकर वे स्थानीय स्क्रैप एजेंसी को बेचते हैं। एक किलो प्लास्टिक बेचने पर उन्हें मात्र ₹12 मिलते हैं। लेकिन वे इसे केवल कमाई का जरिया नहीं मानते, बल्कि उनका असल मकसद अपनी प्यारी झील को साफ रखना है। उनका कहना है कि "यह काम कोई न कोई तो करेगा ही, तो मैं क्यों नहीं?"

पीएम मोदी और यूएन (UN) ने भी की सराहना

राजप्पन जी का यह कार्य तब दुनिया की नजर में आया जब एक स्थानीय फोटोग्राफर ने उनकी कहानी और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में उनके इस काम का जिक्र करते हुए उन्हें प्रेरणास्रोत बताया। इसके अलावा, यूएन पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के पूर्व प्रमुख एरिक सोल्हेम ने भी उनके काम की जमकर तारीफ की।

एक सीख जो सभी के लिए प्रेरणा है

एन.एस. राजप्पन की कहानी हमें यह सिखाती है कि समाज और पर्यावरण में बड़ा बदलाव लाने के लिए किसी बड़ी संस्था या भारी-भरकम फंड की जरूरत नहीं होती। एक अकेले इंसान की दृढ़ इच्छाशक्ति भी प्रकृति को बचाने में बहुत बड़ा योगदान दे सकती है।

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