भारत का स्वास्थय सिस्टम पूरी तरह ख़राब हो चुका है। अगर सच कहें तो जैसे कैंसर की बामारी शरीर में लगने के बाद उससे छुटकारा मुश्किल हो जाता है वैसे ही दवा के क्षेत्र में भी कैंसर लग चुका है। आप को यकीन नहीं होगा, ड्रग कंपनियां, डॉक्टर और केमिस्ट तीनों मिलकर हजारों लाख करोड़ रुपये की लूट करते हैं। इससे भी आश्चर्यजनक बात यह है कि लूट वाला ज्यादातर पैसा गरीबों का होता है। ऐसा नहीं है कि सभी डॉक्टर बेईमान होते हैं, कुछ फ़ीसदी सही भी होते हैं।
क्या दवाएं सस्ती हो सकती हैं
इसका जबाब है हाँ। भारत में एवरेज लगाकर देखा जाए तो स्वास्थय और दवा पर हर आदमी सबसे अधिक पैसा खर्च करता है। आपको जानकार हैरानी होगी कि लोग लाखों रुपये का बैंक बैलेंस यही सोचकर रखते हैं कि क्या पता परिवार में कोई कब बीमार हो जाए और पैसा काम आ जाए। यही नहीं बुढापे के लिए भी लोग यही सोचकर पैसा बचाते हैं कि ‘चार पैसे जमा रहेंगें तो इलाज में काम आयेंगे। लेकिन दुःख की बात यह है कि भारत में दवाएं अपने दाम से अधिक मिलती हैं और दवाओं से मिलने वाला कमीशन वो लोग खा जाते हैं जिन्हें हम भगवान कहते हैं।
जिस दिन हमारे देश के लाखों डॉक्टर, दवा कंपनियों के मेडिकल रिप्रजेंटेटिव से कह देंगे कि ‘भैया हमें आपसे एक भी पैसा कमीशन नहीं चाहिए’ उसी दिन से दवाओं के दाम आधे से भी अधिक कम हो जाएंगे। आप अगर ध्यान दें तो सभी डॉक्टर दिन में एक घंटे मरीजों का इलाज छोड़कर मेडिकल रिप्रजेंटेटिव से मिलते हैं। इस दौरान मेडिकल रिप्रजेंटेटिव डॉक्टरों को यह लालच लेते हैं कि अगर आप हमारी कंपनी की इस दवा को मरीजों के लिए लिखें तो हम आपको 10-40 फ़ीसदी कमीशन देंगे। यह भी लालच दिया जाता है कि कमीशन तो हम देंगे ही, इसके अलावा हर साल कोई बड़ा गिफ्ट, जैसे टीवी, वाशिंग मशीन, लैपटॉप आदि देंगे। इतनी बड़ी लालच मिलने पर डॉक्टर का ईमान डगमगा जाता है और वह अपने मरीजों को वही दवा लिखता है जो दवा कंपनियों के मेडिकल रिप्रजेंटेटिव उन्हें कहते हैं।
इसके बाद दवा कंपनी दवाओं के दाम में डॉक्टर का कमीशन और मेडिकल रिप्रजेंटेटिव को दी जाने वाली सैलरी भी जोड़ लेती है और सभी दवाएं मेडिकल स्टोर पर रखवा दी जाती हैं। डॉक्टर मरीज की पर्ची में वही दवा लिखता है, मरीज को उसी मेडिकल स्टोर से दवा लेने को कहता है और मरीज को वही दवा मिलती है जिसमे डॉक्टर को कमीशन मिलना तय होता है। इस तरह से मरीज को जो दवाएं 50 रुपये में मिलनी चाहियें वही दवाएं 100 रुपये में मिलती हैं और देखते ही देखते मरीज लूट लिया जाता है।
ब्रांडेड दवाओं में होती है अधिक लूट
दरअसल हमारे देश में दवा कंपनियों ने बहुत बड़ा मकडजाल फैला रखा है। प्राइवेट दवा कंपनियां दो तरह की दवाएं बनाती हैं – जेनेरिक और एथिकल (ब्रांडेड)। दोनों दवाएं एक ही होती हैं, एक ही कम्पोजीशन होता है और शरीर में एक ही असर करती हैं। दोनों में सिर्फ यही अंतर होता है कि जेनेरिक दवाओं की मार्केटिंग और ब्रांडिंग पर पैसा नहीं खर्च किया जाता। ऐसी दवाओं पर दवा कंपनियां लूट नहीं मचातीं और लागत के बाद थोडा सा फायदा लेकर उन्हें बाजार में उतार देती हैं। ऐसी दवाओं के दाम भी बढ़ाकर नहीं लिखे जाते और ज्यादातर सरकारी और ईएसआई अस्पतालों में यही दवाएं आती हैं।
लेकिन ब्रांडेड दवाओं पर दवा कंपनियां जमकर पैसा खर्च करती हैं, उनकी मार्केटिंग की जाती है, दवा कम्पनियाँ अपने मेडिकल रिप्रजेंटेटिव (MR) को डॉक्टरों के पास भेजती हैं। डॉक्टरों को ब्रांडेड दवाओं को ही मरीजों को ज्यादा से ज्यादा लिखने को बोला जाता है और बदले में 10-40 फ़ीसदी कमीशन और मोटे मोटे गिफ्ट दिए जाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि डॉक्टर मरीजों को वही दवा लिखते हैं और बदले में मोटा कमीशन कमाते हैं।
इन्हीं सबके चलते दवाओं के दाम कई गुना बढ़ जाते हैं और देश में करोड़ों लोग दिन दहाड़े लूट लिए जाते हैं। उदाहरण के लिए – समझ लीजिये दवा कंपनी ने जेनेरिक और ब्रांडेड दो तरह की दवा बनाई है। जेनेरिक और ब्रांडेड दोनों दवाओं में लागत आई है 10 रुपये। अब दवा कंपनी जेनेरिक दवा के 10 रुपये के पैकेट पर 2 रुपये मुनाफा कमाकर दवा बाजार में उतार देती है। इन दवाओं के दाम भी 12 रुपये की लिखे रहेंगे तो मरीजों को भी 12 रुपये में ही यह दवा मिलेगी। सरकारी अस्पतालों में यही दवाएं मिलती हैं लेकिन प्राइवेट अस्पताल और प्राइवेट डॉक्टर ये दवाएं नहीं लिखते क्यूंकि उन्हें इन दवाओं पर कमीशन नहीं मिलता।
अब ब्रांडेड दवा पर दवा कंपनियां मार्केटिंग और ब्रांडिंग पर मोटा खर्चा करती हैं और सरकार को उससे भी मोटा खर्चा दिखाकर दवा के दाम 12 रुपये की जगह 100 रुपये लिखे जाते हैं। मेडिकल रिप्रजेंटेटिव (MR) डॉक्टर के पास जाते हैं और उनसे कहते हैं कि आप इस दवा को अपने मरीजों को लिखो, हम आपको हर 10 टेबलेट पर 40 रुपये का कमीशन देंगे और दिवाली गिफ्ट भी देंगे। ध्यान दीजिये अगर दवा कंपनी हर 10 टेबलेट पर डॉक्टर को 40 रुपये भी देती है तो उसका लागत तो 10 रुपये ही था। जेनेरिक दवा पर उसे केवल 2 रुपये मिल रहे थे लेकिन ब्रांडेड दवा पर उसे पचास रुपये मिल रहे हैं।
इसीलिए दवा कंपनियों ने हमारे देश में लूट का मकडजाल फैला रखा है और दो रुपये मुनाफा कमाने का बजाय 50 रूपया मुनाफा कमा रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि हमारे देश के लोगों को जो दवाएं 12 रुपये में मिलनी चाहिये वही 100 रुपये में मिलती है और सबसे अधिक गरीब मरीज ही लुटते हैं।
क्या लूट से बचने का कोई रास्ता भी है
इस लूट से बचने का सिर्फ एक ही रास्ता है। दवा खरीदने के बाद केमिस्ट से पक्का बिल लें और उसे जेनेरिक दवा देने के लिए कहें। अगर जेनेरिक दवा ना भी मिले तो इन्टरनेट पर दवा का रेट पता करें और देखें कि डॉक्टर और केमिस्ट आपसे कितना पैसा लूट रहे हैं।
क्या कर रही है सरकार
इस मामले में सरकार ने अभी तक कोई सख्त कदम नहीं उठाया है। हालाँकि ऑनलाइन दवा बिकने और इन्टरनेट की वजह से लूट में कुछ कमी आई है लेकिन अभी भी बहुत लूट मची है। सरकार को ऐसा प्लेटफार्म उपलब्ध करना चाहिए ताकि मरीज को तुरंत ही दवा के असली दाम की जानकारी हो सके और लूटखोरों पर केस दर्ज करा सके। सरकार ने एक हिंदी वेबसाइट राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) लांच की है लेकिन इसमें केवल 1 फ़ीसदी दवाओं की ही जानकारी दी गयी है और कई महीनों से वेबसाइट अपडेट ही नहीं हुई है। अगर सरकार सभी दवाओं के दाम की जानकारी उपलब्ध करा दे तो शायद करोड़ों मरीज लुटने से बच जाएंगे और कमीशन खोर डॉक्टरों की पहचान हो सकेगी।
