इस अनोखे विष्णु मंदिर की मगरमच्छ करता है रखवाली, खाता है मंदिर का प्रसाद

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     भारत दुनिया का एक मात्र ऐसा देश है, जहां हजारों हजार सालों से आ रही परम्पराएं अब भी उसी रूप में यथावत हैं, जैसे पहले हुआ करती थीं। हर ओर फिजिक्स ढूंढने वाले भौतिक वैज्ञानिकों के लिए भारत हमेशा से एक पहेली के रूप में रहा है। आए दिन ऐसी कई अद्भुत घटनाएं सुनने को मिलती हैं, जो सभी वैज्ञानिक और जैविक शास्त्रों के सिद्धांतों में अपवाद के रूप में स्वयं ही शामिल हो जाती हैंं।
    आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे, जहां रक्षा का जिम्मा कई सालों से एक ‘मगरमच्छ’ ने ले रखा है। सबसे बड़ी बात यह मगरमच्छ पूर्णतः शाकाहारी है और केवल मंदिर से मिले प्रसाद को ही ग्रहण करता है।
झील पर स्थित है मंदिर
    यह मंदिर केरल के कासरगोड जिले में स्थित है। यह 9वीं शताब्दी का एक विष्णु मंदिर है,जिसे अनंतपुर लेक टेम्पल के रूप में प्रसिद्धि मिली हुई है। मंदिर एक झील के बीचोबीच बना हुआ है, जहां जाने के लिए पुल की व्यवस्था की गई है।
    स्थानीय जन-मान्यताओं के मुताबिक़, यह मंदिर तिरुअनंतपुरम के अनंत-पद्मनाभस्वामी का मूल स्थान है। यह केरल का इकलौता झील मंदिर है। इस मंदिर में पहले दक्षिण के महान संत विल्वमंगल पूजा-अर्चना किया करते थे। सबसे पहले उन्हें ही भगवान अंनत पद्मनाभस्वामी ने दिव्यआभामंडल युक्त ‘बालक’ रूप में उन्हें दर्शन दिए थे।
   यद्यपि, पहले वे उन्हें पहचानने में असफल रहे, पर उनके प्रस्थान के बाद उन्हें एक महुए के पेड़ में (जहां वह बालक रूप में दिखाई दिए थे) पांच अनंत सर्पों युक्त आसन में विराजमान भगवान पद्मनाभस्वामी के दर्शन हुए।
औषधियों से बनाई गई हैं मूर्तियां
इस मंदिर की एक और विशिष्टता यह भी है कि यहां मंदिर की प्रमुख मूर्तियां किसी धातु या पाषाण से नहीं, अपितु विभिन्न औषधियों के अद्भुत मिश्रण से बनाई गई हैं। औषधियों का यह मिश्रण ‘कादु शर्करा योग’ कहलाता है।
    हालांकि, वर्ष 1972 में इस आदर्श रसायन से निर्मित मूर्तियों को पंचलौह की मूर्तियों से प्रतिस्थापित कर दिया गया था। लेकिन जल्द ही यहां पुनः उसी मिश्रण के रसायन की मूर्तियों को प्राणप्रतिष्ठित कर विराजमान किए जाने की तैयारियां हैं। मंदिर की छत के भीतरी तल की काष्ठनक्काशी अद्भुत स्थापत्य कला को प्रदर्शित करती है। इसे नमस्कार मंडपम के रूप में भी जाना जाता है।
पुजारी खिलाते हैं ‘मगरमच्छ’ को प्रसाद
    स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक़ लगभग 60 सालों से यहां मगरमच्छ मंदिर परिसर की झील में रह रहा है। मगरमच्छ का नाम ‘बबिया’ रखा गया है। मंदिर के पुजारी मानते हैं की ‘बबिया’ इस पूरे इलाके और मंदिर परिसर की रक्षा के निमित्त एक देवदूत है। वह झील में रहने वाले किसी भी जीव को किंचित भी नुकसान नहीं पहुंचाता है।
    मंदिर में भगवान को चावल और चाशनी युक्त मीठे चावल को भोग लगाया जाता है। सिर्फ इसे ही मगरमच्छ को खिलाया जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि वह प्रसाद सिर्फ मंदिर प्रबंधन के सदस्यों द्वारा ही ग्रहण करता है। किसी अन्य व्यक्ति से वह कुछ भी ग्रहण नहीं करता।
स्वयं ही प्रकट होते रहे हैं ‘मगरमच्छ’
     मंदिर के रक्षक की भूमिका निर्वाह करने वाले मगरमच्छ के बारे में माना जाता है कि झील में एक मगरमच्छ की मृत्यु होती है, तो रहस्यमय ढंग से दूसरा मगरमच्छ स्वतः प्रकट हो जाता है। सालों पहले एक ब्रिटिश सिपाही ने मगरमच्छ को गोली मार दी और झील को मगरमुक्त करने का प्रयास किया।
    चमत्कारिक रूप से अगले ही दिन फिर एक मगरमच्छ झील में दिखाई पड़ा और दो-तीन दिनों में ही उस सिपाही की सर्पदंश से मृत्यु हो गई। लोग इसे ‘अनंत’ के बदले के रूप में देखते हैं।
     उल्लेखनीय है कि पुराणों में ऐसी कथाएं हमें सुनने को मिलती रही हैं, पर यथार्थ में ऐसी कहानियों को घटित होते देखना पौराणिक आख्यानों की प्रमाणिकता को प्रदर्शित करता है। संभवतया, हम उस स्तर पर पहुंच ही नहीं सके हैं, जहां पौराणिक काल में हमारे पूर्वज हुआ करते थे।
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