
सीवान के पत्रकार की हत्या दुखद है. लेकिन, इससे भी ज्यादा इस पर सोचने की जरूरत है. क्या बिहार मेँ कानून का भय कम हो रहा है? नीतीश पार्ट 1 और पार्ट 2 मेँ अपराध इसलिए कम नहीँ हुआ कि पुलिस को अपराध होने से पहले ही अपराध का पता चल जाता था, बल्कि कानून का एक आवश्यक भय लुच्चोँ-लफंगोँ मेँ पैदा हुआ था. निश्चित तौर पर वह भय कम हो रहा है. ऐसा क्योँ हो रहा है, इसके कई कारण हो सकते है. नीतीश कुमार जैसे मजबूत नेता अगर राजनीतिक मजबूरियोँ के नाम पर कमजोर हो रहे है तो यह भी दुखद है. शायद तभी, नीतीश पार्ट 3 मेँ लगातार हत्याएँ हो रही है. फिर सवाल है कि जनता क्या करेँ? जनता के पास कानून पर भरोसा करने, सरकार पर भरोसा रखने मात्र जैसे विकल्प होते है. लेकिन, इतने भर से भी काम नहीँ बनने वाला. एक अहम तथ्य ये भी है कि बिहार मेँ हमलोगोँ ने इन लुच्चे-लफंगोँ का खुद ही महिमामंडन भी किया है. उन्हेँ ग्लैमराइज किया है, हीरो, राबिनहुड, बाहुबली बनाया है. अपनी-अपनी जाति का नायक बनाया है, उन्हेँ विधायक बनाया, मंत्री बनाया, सांसद बनाया. और, ये लफंगे ही आज हमारे लिए भस्मासुर बन गए है. मुझे लगता है कि कानून पर भरोसा रखते हुए भी बिहार की जनता को अपनी तरफ से कुछ ऐसा करना होगा, जिससे इन गुंडोँ का सामाजिक तिरस्कार हो. उनका दुस्साहस जनता की ताकत के आगे कमजोर पडे.
एक पत्रकार की हत्या हुई है. मान लीजिए, जिस दिन सौ पत्रकार, हजार लोग इन गुंडोँ के खिलाफ लिखने लगेंगे, तो क्या इन गुंडोँ मेँ इतनी हिम्मत है कि वे सब की हत्या कर सके. फिर, आज तो कुछ लिखने या बोलने के लिए अखबार की भी जरूरत नहीँ है. सोशल मीडिया मेनस्ट्रीम मीडिया से कतई कम नहीँ है. चाहे गया हो या सीवान, वहाँ के स्थानीय लोग, पत्रकार एकजुट हो कर ऐसे गुंडोँ के खिलाफ धरना दे सकते है, उनके खिलाफ ज्यादा से ज्यादा लिख सकते है. जिस सच को ये गुंडे छुपाना चाहते है, उसे सार्वजनिक कर सकते है. जनता की शिकायत सरकार और पुलिस की निष्क्रियता से तो होती ही है. लेकिन, एक बार जनता इन गुंडोँ से सीधी लडाई लड ले, इसमेँ क्या हर्ज है?
