Breaking News
Loading...

तो क्या बंद हो जाएगा दुनिया का एकमात्र संस्कृत अखबार ?

    दुनिया का एकमात्र संस्कृत अखबार 'सुधर्मा' बंद होने की कगार पर है। अखबार साल 1970 से चल रहा है। कर्नाटक के मैसूर से निकलने वाले दैनिक को संस्कृत के महान विद्वान कलाले नांदुर वरदराज आयंगर ने शुरू किया था।
     अखबार शुरू करने का मकसद संस्कृत भाषा के अस्तित्व को बचाए रखना और उसका प्रचार-प्रसार करना था। बिजनेस इंसाइडर की खबर के मुताबिक अखबार का मौजूदा सर्कुलेशन करीब 3000 कॉपी तक ही सिमटा हुआ है।
     एक पेज के इस अखबार को केरल, असम, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, तमिलनाडू के पुस्तकालयों में जगह मिलती है। इसके अलावा पाठकों में ज्यादातर विद्यार्थी, शिक्षण संस्थानों और धार्मिक संस्थानों के लोग शामिल हैं। यह भी एक विडंबना ही है कि अखबार के ज्यादातर पाठक विदेश से हैं। आयंगर ने तत्कालीन सूचना मंत्री आई के गुजराल को संस्कृत में न्यूज बुलेटिंस निकलवाने की गुजारिश की थी। हालांकि, अखबार का सर्कुलेशन महज 3,000 तक सिमट गया है, लेकिन इसके ई-पेपर के एक लाख से ज्यादा पाठक हैं जिनमें ज्यादातर इसराइल, जर्मनी और इंग्लैंड के हैं। ज्यादातर सब्सक्राइबर्स संस्थाएं, शैक्षिक प्रतिष्ठान और धार्मिक संस्थाएं हैं। हालांकि, देश में 13 संस्कृत विश्वविद्यालय हैं और कर्नाटक में 18 संस्कृत कॉलेज हैं, लेकिन अखबार को आर्थिक मदद देने वाला विरले ही हैं।
      अखबार का सर्कुलेशन कम होने की वजह से आयंगर के सुपुत्र और अखबार के मौजूदा संपादक वी. संपतकुमार नाखुश हैं और अखबार के बंद होने की संभावना से भी इन्कार नहीं कर रहे हैं।
     संपत कहते हैं कि देवों की भाषा संस्कृत का इतिहासिक महत्व है, जिसे वो दुनिया को समझाना चाहते हैं लेकिन नाकाम हो रहे हैं। वो कहते हैं कि हम अपनी विरासत की उपेक्षा भले ही करें लेकिन दुनिया सबसे संपन्न भाषा के तौर पर संस्कृत का लोहा मान रही है।
    अखबार ज्यादातर योग, वेद, संस्कृति और राजनीति की खबरें छापता है। सुधर्मा का ई-पेपर भी है जिसे करीब डेढ़ लाख लोग पढ़ते हैं।
    फिलहाल अखबार को जिंदा रखने के लिए इसके संपादक ने चंदा मांगा है। अखबार की तरफ से सरकार से भी मदद की गुहार लगाई जा चुकी है। सरकार की तरफ से फिलहाल कोई सहयोग नहीं मिल रहा है।संपत कहते हैं कि देवों की भाषा संस्कृत का इतिहासिक महत्व है, जिसे वो दुनिया को समझाना चाहते हैं लेकिन नाकाम हो रहे हैं। वो कहते हैं कि हम अपनी विरासत की उपेक्षा भले ही करें लेकिन दुनिया सबसे संपन्न भाषा के तौर पर संस्कृत का लोहा मान रही है।
    अखबार ज्यादातर योग, वेद, संस्कृति और राजनीति की खबरें छापता है। सुधर्मा का ई-पेपर भी है जिसे करीब डेढ़ लाख लोग पढ़ते हैं।
   फिलहाल अखबार को जिंदा रखने के लिए इसके संपादक ने चंदा मांगा है। अखबार की तरफ से सरकार से भी मदद की गुहार लगाई जा चुकी है। सरकार की तरफ से फिलहाल कोई सहयोग नहीं मिल रहा है।