लोग उसे बंदर नहीं बल्कि बेटे की तरह मानते थे, इंसानों की तरह निकली अंतिम यात्रा

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सबके लाड़ले बंदर की इंसानों की तरह निकली अंतिम यात्रा, मंत्रोच्चार के साथ पुजारी ने दी मुखाग्नि   
    एमपी के नीमच जिले में एक बंदर की अंतिम यात्रा में पूरा गांव उमड़ पड़ा. इस बंदर को न सिर्फ एक बेटे की तरह विदाई दी गई, बल्कि मुखाग्नि भी पुजारी ने दी.
    नीमच के विक्रमनगर खोर में एक बंदर दो दिन पहले घायल हो गया था. घायल होने के बाद से ही वो गांव के मंदिर में लेटा हुआ था. शनिवार शाम को उसकी मौत हो गई. हिंदू धर्म के अनुसार सूर्यास्त के बाद किसी का अंतिम संस्कार नहीं किया जाता इसलिए रविवार को बंदर का अंतिम संस्कार किया गया.
बंदर नहीं गांव का बेटा था
     ग्रामीणों का इस बंदर से खास लगाव था.उन्होंने इसे रामभक्त नाम दिया था. ग्रामीणों की मानें तो रामभक्त ने कभी भी किसी को परेशान नहीं किया. वो सबके साथ ही प्यार से बर्ताव करता था. इस वजह से वो सबका लाड़ला था. लोग उसे बंदर नहीं बल्कि बेटे की तरह मानते थे. ऐसे में जब वो घायल अवस्था में मंदिर में रह रहा था तो महिलाएं उसे अपने हाथों से खाना खिला रही थीं.
इंसानों की तरह निकली अंतिम यात्रा
    रामभक्त की अंतिम यात्रा भी इंसानों की तरह निकाली गई. पहले तो उसके शव को स्नान करवाया गया. फिर उसके शरीर पर केसरिया कपड़ा लपेटा गया साथ ही सिर पर गुलाबी पगड़ी भी बांधी गई. इसके बाद उसकी अंतिम यात्रा निकाली गई.
    इस अंतिम यात्रा में पूरा गांव उमड़ पड़ा. अपने लाड़ले बंदर को आखिरी विदाई देने के दौरान सभी की आंखें नम हो गई. मंदिर से शुरू हुई अंतिम यात्रा गांव के चक्कर लगाती हुई मुक्तिधाम पहुंची. बीच में लोग शव पर नारियल और पैसे भी चढ़ाते रहे. मुक्तिधाम पहुंचने पर पूरे विधि-विधान से मंत्रोच्चार के साथ रामभक्त का अंतिम संस्कार किया गया. रामभक्त को मुखाग्नि गांव के पुजारी ने दी.
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