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कैराना : "पलायन" !! विवशता और समाधान!!!

     कैराना से हिंदुओं का पलायन कोई नया नहीं है देश में हज़ारो स्थान व मोहल्ले ऐसे है जहां से मुसलमानों के दुर्व्यवहारों व अत्याचारों से उत्पीड़ित होकर हिंन्दुओ को पलायन करना पडता है। लोकतंत्र में मुस्लिम पोषित राजनीति के परिणामस्वरुप प्रशासन जिसका नागरिकों की सम्पूर्ण सुरक्षा का संवैधानिक दायित्व है, इस षड्यंत्रकारी देशद्रोही गतिविधियों की निरंतर अनदेखी करता आ रहा है ।जिससे कट्टरपंथियों को जिहाद के लिए काफ़िरों की भूमि का इस्लामीकरण करना सरल हो जाता है। ध्यान करना होगा की हर मुसलमान के लिए "जिहाद " उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण धार्मिक कार्य है। इस्लाम में जिहाद के लिए अनेक प्रकार होते है उसी में से एक है गैर मुस्लिमों को उनके मूल स्थानों से उखाड़ना। अतः यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा कि हिंदुओं या अन्य गैर मुस्लिमों को अपनी अपनी भूमियों से उखाड़ कर उनको पलायन करने को विवश करना इस्लाम में एक धार्मिक कार्य है।
      हम हिंदुओं का दुर्भाग्य है कि हमारा नेतृत्व हमें लक्ष्य से भटका कर अपने अस्तित्व की रक्षार्थ शत्रु व शत्रुओं के पनपते षडयंत्रो से अवगत नहीं करवाता और हम अज्ञानतावश भौतिक युग में भोगविलास से जीने को उच्च प्राथमिकता देने लगे है। साथ ही साथ अनेक धर्म-कथायें, भजन, कीर्तन एवं धार्मिक पर्यटन आदि से धर्म लाभ लेकर हम आत्म संतुष्ट हो जाते है। लेकिन हम अपने अस्तित्व की रक्षार्थ जिहादियों के शत्रुतापूर्ण व्यवहार के प्रति कभी सक्रिय नहीं होते? हमको निरंतर अत्याचारों को सहने व उसके प्रति उदासीन बनें रहने का स्वभाव हो गया है। जबकि हम अपने ही घर में अहिंसा व शांति के साथ रह भी नहीं सकते क्योंकि आतताईयों और आतंकियों का भय मंडराता रहता है।
     क्या हमारा नेतृत्व हमको कभी जिहाद के विरुद्ध सजग व सतर्क होने की प्रेरणा देगा ? हम कब तक भीरु व कायर बन कर सहनशील बनें रहेंगे ? कब तक हिंसक के आगे अहिंसक बन कर सुरक्षित रह पायेंगे ? हमको साम्प्रदायिक सौहार्द बनाये रह कर धैर्य रखने के लिये कहने वाले राजनीतिज्ञ क्यों निरंतर मुस्लिमों को ही एक तरफ़ा अनेक योजनाओ द्वारा पोषित करते रहते है ? क्यों नहीं कट्टरपंथियों और घुसपैठियों पर प्रभावकारी अंकुश लगाने के लिए सशक्त कानून बना कर राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित की जाती ? क्या एक तरफ़ा बाहें पसारे खड़ा हिन्दू समाज अपना भला-बुरा छोड़ कर राजनेताओं की तरह मुस्लिम समाज के साथ समरसता में लगा रहे और वे उस समर्पण को चापलूसी से अधिक महत्व ही न दें तो फिर कैसी समरसता और कैसा साम्प्रदायिक सौहार्द ?
      सन् 1990 को मत भूलों जब कश्मीर से भी हिन्दू जनता को सामुहिक नरसंहार, खुली चेतावनी, अपमान,ब्लात्कार और अपहरण आदि द्वारा उत्पीड़ित करके भगाया गया था और पुरा देश मौन बनकर देखता रहा जबकि भारत लाखो की सेना वाला स्वतंत्र देश है। शेष भारत के हिंदुओं ने भी उस समय कोई प्रतिकार नही किया क्योंक़ि तथाकथित हिंदुत्व वादी नेतृत्व अवसरवादी तो है पर संघर्षशील नहीं ? आज भाग्यवश केंद्र में उन्ही तथाकथित हिन्दुत्वादियों की सरकार है फिर कैराना की इस स्थिति का कौन जिम्मेदार होगा ? आतंकवाद की दुहाई देकर कश्मीर में शेष बचे हुए हिंदुओं की उस समय क्या आज भी कोई गारंटी नहीं ले सकता, तो क्या "जिहाद" के लिए मालदा में हुए भीषण दंगों से उदासीन रहने वाली हमारी केंद्रीय सरकार "कैराना" के हिंदुओं के प्रति कुछ निर्णायक पहल करेगी ?
     अतः "राष्ट्र सर्वोपरि" के भाव को आत्मसात करके सम्पूर्ण भारत में राष्ट्रीय एकता व सामाजिक समरसता को प्रोत्साहन देने के लिए कट्टरपंथियों की सामूहिक सांप्रदायिकता के जिहादी आक्रमण को नियंत्रित करना होगा। लेकिन जब तक देश की राष्ट्रवादी जनता जिहादियों का एकजुट होकर कोई प्रतिकार नहीं करेगी और पलायनवादी मानसिकता का त्याग नहीं करेगी तब तक कश्मीर से कन्याकुमारी तक "कैराना" बनते रहेंगे ?
(Lokpurush Lpn)