तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं के प्रति क्रूरता - इलाहाबाद हाईकोर्ट

Breaking News

10/recent/ticker-posts

Ad Code

तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं के प्रति क्रूरता - इलाहाबाद हाईकोर्ट

   इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की है कि तीन बार तलाक कहना ‘क्रूरता’ है. इससे न्यायिक अंतरात्मा ‘परेशान’ है.
     अदालत ने पूछा कि क्या मुस्लिम महिलाओं की यातना खत्म करने के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ में संशोधन किया जा सकता है. इस प्रथा पर प्रहार करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा है कि इस तरह से ‘तुरंत तलाक’ देना ‘सबसे ज्यादा अपमानजनक’ है जो ‘भारत को एक राष्ट्र बनाने में ‘बाधक’ और पीछे धकेलने वाला है.’ 
महिलाओं पर मनमानी की छूट किसी को नहीं
    न्यायमूर्ति सुनीत कुमार की एकल पीठ ने फैसले में कहा, ‘जो सवाल कोर्ट को परेशान करता है वह यह है कि क्या मुस्लिम पत्नियों को हमेशा इस तरह की स्वेच्छाचारिता से पीड़ित रहना चाहिए? क्या उनका निजी कानून इन दुर्भाग्यपूर्ण पत्नियों के प्रति इतना कठोर रहना चाहिए? क्या इन यातनाओं को खत्म करने को निजी कानून में उचित संशोधन नहीं होना चाहिए? न्यायिक अंतरात्मा इस विद्रूपता से परेशान है. भारत में मुस्लिम कानून पैगम्बर या पवित्र कुरान की भावना के विपरीत है.
► लैंगिक अधिकारों को नकारना शरिया कानून के खिलाफ है और कोई भी देश लैंगिक स्वतंत्रता के बिना आधुनिक नहीं हो सकता. --एमजे अकबर, केंद्रीय मंत्री
► ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मनमाने ढंग से काम करने वाली पुरुषवादी संस्था है जो अनुचित प्रथा और परंपराओं को संरक्षण दे रही है. यह बोर्ड मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करता. ----जकिया सोमान, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह संस्थापक
► हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि कोई समाज संविधान और कानून से चलेगा, न कि पर्सनल लॉ बोर्ड से. --नाइश हसन, मुस्लिम महिला अधिकार कार्यकर्ता व स्तंभकार
फैसले की खास बातें
► जो सवाल अदालत को परेशान करता है, वह यह है कि क्या मुस्लिम पत्नियों को हमेशा इस तरह की स्वेच्छाचारिता से पीड़ित रहना चाहिए? क्या उनका निजी कानून इन दुर्भाग्यपूर्ण पत्नियों के प्रति इतना कठोर रहना चाहिए? क्या इन यातनाओं को खत्म करने के लिए निजी कानून में उचित संशोधन नहीं होना चाहिए?
► भारत में मुस्लिम कानून पैगम्बर या पवित्र कुरान की भावना के विपरीत है. यही भ्रांति पत्नी को तलाक देने के कानून का क्षरण करती है. आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष देश में कानून का उद्देश्य सामाजिक बदलाव लाना है. भारतीय आबादी का बड़ा हिस्सा मुस्लिम समुदाय है, इसलिए नागरिकों का बड़ा हिस्सा और खासकर महिलाओं को निजी कानून की आड़ में पुरानी रीतियों और सामाजिक प्रथाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.
► भारत प्रगतिशील राष्ट्र है, भौगोलिक सीमाएं ही किसी देश की परिभाषा तय नहीं करतीं. इसका आकलन मानव विकास सूचकांक सहित कई अन्य पैमाने पर किया जाता है जिसमें समाज द्वारा महिलाओं के साथ होने वाला आचरण भी शामिल है. इतनी बड़ी आबादी को निजी कानून के मनमानेपन पर छोड़ना प्रतिगामी है, समाज और देश के हित में नहीं है. यह भारत के एक सफल देश बनने में बाधा है और पीछे की तरफ धकेलता है.


Ad Code