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लंकाशायर।। इसमें कोई शक नहीं है कि फेसबुक कहीं न कहीं हमारे जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है लेकिन इसके साथ ही कई बार यह हमारे लिए खतरनाक भी साबित हो सकता है। यह तब घातक हो सकता है जब आप फेसबुक पर दूसरे लोगों की जिंदगी से अपनी जिंदगी तुलना करने लगते हैं।आपने कई लोगों को यह कहते हुए आपने किसी से सुना होगा 'कूल! वह तो हमेशा ट्रेवल करती रहती है और मेरी लाइफ को देखो।' इस तरह की बातें आजकल आम हो गई हैं।
लैकेस्टर यूनिवर्सिटी के हाल ही में हुए शोध में पता चला है कि फेसबुक पर दूसरों से खुद की तुलना करना अवसाद की भावनाओं की तरफ ले जाता है। लैकेस्टर यूनिवर्सिटी से डेविड बैकर और डॉ. गुइलेर्मो पेरेज अल्गोर्ता ने सोशल नेटवर्किंग साइट और डिप्रेशन के बीच में लिक निकालते हुए रिसर्च का रिव्यू किया।
उन्होंने 14 देशों के 15 से 88 साल के 35 हजार प्रतिभागियों के बीच अध्ययन किया। दुनियाभर में ऑनलाइन सोशल नेटवर्किंग साइट पर 1.8 बिलियन लोगों के बीच फेसबुक के ही केवल 1 बिलियन एक्टिव यूजर हैं।
सोशल मीडिया साइट्स पर समय गुजारने वालों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव को लेकर 2011 में अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स ने 'फेसबुक डिप्रेशन' परिभाषित किया था। यह वह डिप्रेशन है जो कि लोगों में सोशल मीडिया साइट्स जैसे फेसबुक पर ज्यादा समय बिताने से होता है।
अध्ययन में पाया गया कि ऑनलाइन सोशल नेटवर्किंग और डिप्रेशन का रिश्ता बहुत जटिल है और उम्र और लिंग से जुड़ा होता है। इस केस में लोग दूसरों से खुद की तुलना करते हुए ज्यादा चिंतन-मनन करने लगते हैं। हालांकि ऑनलाइन सोशल नेटवर्किंग की फ्रीक्वेंसी, क्वॉलिटी और टाइप बहुत महत्वपूर्ण है। फेसबुक यूजर्स में ज्यादा डिप्रेशन के जोखिम को देखा गया जब वे :
- दूसरों को देखकर ईर्ष्या महसूस करते थे
- फेसबुक फ्रेंड्स के रूप में पुराने सहयोगियों को स्वीकारा
- नकारात्मक सामाजिक तुलना की
- लगातार नेगेटिव स्टेट्स अपडेट किया
लिंग और व्यक्तित्व भी इस जोखिम को प्रभावित करते हैं। महिलाएं और विक्षिप्त व्यक्तित्व ज्यादा डिप्रेस्ड होते हैं। लेकिन रिसर्चर्स ने जोर दिया है कि ऑनलाइन एक्टिविटी भी डिप्रेशन से घिरे लोगों की मदद करता है जो कि उसे मेंटल हेल्थ रिसोर्स के रूप में इसका यूज करते हैं।
