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क्या राफेल डील पर झूठ बोल रही हैं रक्षा मंत्री, क्यों लहराया रद्द हुए समझौते का कागज ?

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क्या है और कैसे पकड़ा गया राफेल घोटाला ?
      मूल समझौते के अनुसार दसॉल्ट कंपनी भारत सरकार को 126 राफेल विमान प्रति विमान 526 करोड़ की कीमत पर देगी जिसमे 18 विमान रेडी टू फ्लाई होंगे शेष 108 विमान भारत में सरकारी विमान कंपनी हिंदुस्तान ऐरोनॉटिक्स लिमिटेड ( HAL ) बनाएगी जिसमें ट्रांसफर ऑफ़ टेक्नोलॉजी शामिल होगी !
     12 दिसंबर 2012 को तत्कालीन यूपीए सरकार ने 126 मध्यम बहुउद्देश्यीय राफेल लड़ाकू विमानों के लिए मिसाइल व् अन्य उपकारों सहित 54 हजार करोड़ रुपये में सहमति जताई थी।
      फ्रांस की कंपनी के लिए सौदे का 50 प्रतिशत भारत में निवेश करना अनिवार्य था। इसी आधार पर 13 मार्च 2014 को एचएएल और दसॉल्ट एवियेशन के बीच में समझौता हुआ था। जिसमें 108 लड़ाकू विमान के 70 प्रतिशत कार्य हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड और 30 प्रतिशत डेसाल्ट द्वारा किए जाने थे।
    मोदी सरकार ने 30 जुलाई 2015 को लड़ाकू विमान के यूपीए सरकार के समय से चले आ रही खरीद प्रक्रिया को रद्द कर दिया। 23 सितंबर 2016 को केन्द्र सरकार की तरफ से 8.7 अरब डॉलर में बिना तकनीकी हस्तांतरण के 36 राफेल लड़ाकू विमानों को लिए जाने की सूचना सार्वजनिक हुई।
     अब इसमें मोदी के मित्र अम्बानी प्रकट होते है आनन् फानन में HAL को इससे बाहर कर दिया जाता है और मात्र दो हफ्ते में बनी कागजी कंपनी को कंपनी करार में शामिल कर लिया जाता है जिसे साइकिल बनाने का भी अनुभव नहीं है !
    18 नवंबर, 2016 को लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान रक्षा राज्य मंत्री डा. सुरेश भामरे ने जानकारी देते हुए बताया कि 23 सितंबर, 2016 को फ्रांस और भारत सरकार के बीच 36 राफेल विमान खरीदने का समझौता किया गया। उन्होंने बताया कि प्रत्येक राफेल विमान की लागत लगभग 670 करोड़ रुपए है और साल 2022 तक सभी राफेल विमानों की सप्लाई कर दी जाएगी।
अब जब समझौता हो गया तो सवाल उठने शुरू हुए कि =
HAL को इस डील से बहार क्यों किया गया ?
इस डील में अम्बानी का क्या रोल है ?
      जब अनिल अम्बानी राहुल गाँधी को सफाई देते हुए कहते है कि उसका विमान बनाने और रख रखाव में कोई रोल नहीं है सभी 36 विमान फ़्रांस में बनकर आएंगे तो उसे जब रक्षा क्षेत्र में मैन्युफैक्चरिंग का कोई अनुभव नहीं है तो उसे 42 हजार करोड़ रूपये किस बात के दिए है दसॉल्ट एविएशन ने ?
    सीधी सी बात है सरकारी कंपनी को बाहर कर एक तीसरी दलाल कंपनी को घुसेड़ा गया है ! 50 साल तक इस विमान की रख रखाव की जिम्मेदारी भी अनिल अम्बानी की कंपनी को दे दी गई है ! जिसकी कीमत एक लाख करोड़ है !
- रक्षा राज्य मंत्री लोक सभा में कहते है विमान की कीमत 670 करोड़ है !
- दसॉल्ट कहती है हमने 1670 करोड़ में एक जहाज बेचा है !
- सरकार कहती है कीमत बताई नहीं जा सकती क्योकि यह सिक्योरिटी क्लॉज़ का उलंघन होगा जबकि मोदी जी ने 2008 की वो प्रक्रिया ही रद्द कर दी
    जिसमें इस सिक्योरिटी क्लॉज़के अलावा HAL और ट्रांसफर ऑफ़ टेक्नोलॉजी शामिल थे ? जब 2008 में अनिल अम्बानी कहीं नहीं थे वो कैसे शामिल हुए तो कहते है वो 2008 का समझौता रद्द हो गया यह नया समझौता 23 सितंबर 2016 को  किया है जिसमे HAL को निकल अम्बानी को घुसेड़ दिया गया है ?
     यानि असली कीमत नहीं बताने के लिए 2008 का समझौता लागू है और HAL को निकालने और अम्बानी को फ्री में 42 हजार करोड़ देने के लिए पुराना समझौता रद्द है नया करार किया है ? मित्रो चोरी चोरी होती है चाहे कितने ही तरीके से की जाये पकड़ी ही जाती है ?

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