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आरटीआई रैंकिग: मनमोहन सरकार में नंबर 2 पर था भारत, मोदी राज में 6 पर लुढ़का

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    नरेंद्र मोदी के शासन काल में सूचना का अधिकार (आरटीआई) रैंकिंग में भारत की स्थिति मजबूत नहीं रही। 123 देशों की लिस्ट में भारत अब पहले के मुकाबले पिछड़कर छठे स्थान पर चला गया है जबकि साल 2011 में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भारत दूसरे नंबर पर था। साल 2011 में ही आरटीआई पर ग्लोबल रेटिंग की शुरुआत हुई थी। मानवाधिकारों पर काम करने वाली विदेशी गैर सरकारी संस्था एक्सेस इन्फो यूरोप और सेन्टर फॉर लॉ एंड डेमोक्रेसी का यह संयुक्त प्रोजेक्ट है। इसके जरिए 123 देशों में सूचना का अधिकार कानून की खूबियों और कमजोरियों के पहलुओं की समीक्षा की जाती है और वैश्विक स्तर पर एक लिस्ट तैयार की जाती है। इस लिस्ट को तैयार करने में 150 प्वाइंट स्केल का इस्तेमाल किया गया है। इसके तहत 61 इंडिकेटर्स को कुल सात मानकों में विभाजित कर आरटीआई से जुड़ी सुविधाओं की स्थिति का परीक्षण किया गया है।
      संस्था ने विभिन्न देशों में आरटीआई तक पहुंचने का अधिकार, दायरा, अनुरोध प्रक्रिया, अपवाद और इनकार, अपील, अनुमोदन एवं सुरक्षा और आरटीआई का प्रचार तंत्र के सर्वेक्षण के आधार पर इस लिस्ट को तैयार किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2017 में आरटीआई के तहत भारत में कुल 66.6 लाख आवेदन प्राप्त हुए। इनमें से करीब 7.2 फीसदी यानी कुल 4.8 लाख आवेदनों को खारिज कर दिया गया जबकि 18.5 लाख आवेदन अपील के लिए सीआईसी के पास पहुंचे। इस दौरान सीआईसी ने आवेदकों के अपील पर 1.9 करोड़ रुपये का जुर्माना भी ठोका है।
     ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में केवल 10 राज्यों ने ही इससे जुड़ी वार्षिक रिपोर्ट अपडेट की है। रिपोर्ट के मुताबिक 12 राज्यों के राज्य सूचना आयोग में कोई पद खाली नहीं है। हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि देशभर में सूचना आयोगों में कुल 30 फीसदी पद यानी स्वीकृत कुल 156 पदों में से 48 पद खाली हैं। एक्सेस इन्फो यूरोप और सेन्टर फॉर लॉ एंड डेमोक्रेसी रिपोर्ट के मुताबिक साल 2011, 2012 और 2013 में ग्लोबल रेटिंग में भारत नंबर दो पर था लेकिन उसके बाद के वर्षों में भारत लुढ़कता चला गया। फिलहाल स्लोवेनिया, श्रीलंका, सर्बिया, मैक्सिको और अफगानिस्तान से भी पीछे जाकर छठे नंबर पर जा लुढ़का है।

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