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शक्तिपीठ, शिल्पकला और पांडवकालीन इतिहास: वागड़ अंचल का गौरव "कुशलगढ़"

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तीन राज्यों की सीमा पर बसी कुशलगढ़ नगरी: इतिहास, आस्था और पर्यटन का अनमोल संगम

कुशलगढ़ (बांसवाड़ा) राजस्थान के दक्षिणी छोर पर, जहां तीन राज्यों—राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश—की सीमाएं आपस में मिलती हैं, वहां बसी ऐतिहासिक कुशलगढ़ नगरी आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है। अपनी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत, गहरी धार्मिक आस्था, अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य और जीवंत सांस्कृतिक वैभव के कारण यह नगरी पूरे वागड़ अंचल का गौरव बनी हुई है। सदियों से संतों, महात्माओं और तपस्वियों की तपोभूमि रही यह धरा आज भी अपने भीतर गौरवशाली अतीत को समेटे हुए है।

युवा संत सभा राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष ऋषि योगी ईश्वर नाथ जी महाराज का कहना है कि कुशलगढ़ का इतिहास केवल एक रियासत तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र पौराणिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी एक अनमोल खजाना है। यदि इस धरोहर का सही ढंग से संरक्षण और प्रचार-प्रसार किया जाए, तो कुशलगढ़ देश के प्रमुख पर्यटन और धार्मिक मानचित्र पर अपनी एक विशिष्ट पहचान बना सकता है।

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पौराणिक और ऐतिहासिक धरोहरों का केंद्र

कुशलगढ़ का कोना-कोना इतिहास और आस्था की कहानियों से जीवंत है। इस पावन धरा पर मौजूद प्रमुख स्थल पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं:

  • महाभारतकालीन कोकिला वन (घोटिया आंबा): स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय इसी घने और मनोरम वन क्षेत्र में बिताया था।

  • केलापानी धाम और चौसठ जोगणिया: केलापानी धाम जहां वर्षभर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहता है, वहीं चौसठ जोगणिया मंदिर प्रमुख शक्तिपीठ के रूप में विख्यात है, जहां नवरात्रि में तीनों राज्यों से भक्तों का तांता लगता है।

  • शिव आराधना के प्राचीन केंद्र: मठ मंगलेश्वर, नागनाथ महादेव, नागदरा और स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने बिजलेश्वर महादेव मंदिर में महाशिवरात्रि और सावन के महीने में भक्ति का अनूठा माहौल देखने को मिलता है।

  • देशभर में प्रसिद्ध अंदेश्वर जैन तीर्थ: अपनी उत्कृष्ट शिल्पकला और शांत वातावरण के लिए यह जैन तीर्थ देशभर के श्रद्धालुओं की साधना का प्रमुख केंद्र है।

  • मगरी माता, नाल वाले हनुमान जी, कसूम्बर बावसी और वागोल जी: ये सभी स्थल स्थानीय समाज की अटूट श्रद्धा के प्रतीक हैं, जहां मेलों के दौरान हजारों की भीड़ उमड़ती है।

  • रहस्यमयी गुफाएं और कंदराएं: क्षेत्र में मौजूद प्राचीन गुफाएं पुरातात्विक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। इतिहासकारों का मानना है कि यहां गहन शोध से इतिहास के कई बड़े रहस्य सामने आ सकते हैं।

आदिवासी संस्कृति और पर्यटन की अपार संभावनाएं

कुशलगढ़ अपनी अनूठी आदिवासी संस्कृति के लिए भी जाना जाता है। यहां के पारंपरिक लोकगीत, लोकनृत्य, वेशभूषा और उत्सव वागड़ की वास्तविक आत्मा को प्रदर्शित करते हैं।

प्राकृतिक और धार्मिक रूप से संपन्न होने के कारण इस क्षेत्र में पर्यटन विकास की अपार संभावनाएं हैं। यदि यहां सड़कों का सुधार, ठहरने की उत्तम व्यवस्था, सूचना केंद्र और गाइड जैसी बुनियादी सुविधाएं विकसित की जाएं, तो यह क्षेत्र न केवल देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करेगा, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए द्वार भी खोलेगा।

धरोहरों के संरक्षण की उठ रही मांग

राष्ट्रीय मानव धर्म रक्षा संघ प्रमुख संत नरसिंह गीरी महाराज, नारी शक्ति प्रमुख साधना पंचाल (डुंगरीपाडा) और ऋषि योगी ईश्वर नाथ जी महाराज ने सरकार, पुरातत्व विभाग और स्थानीय प्रशासन से इन अमूल्य धरोहरों के संरक्षण और सौंदर्यीकरण के लिए ठोस कदम उठाने की अपील की है। संतों का कहना है कि कुशलगढ़ की पहचान केवल एक सीमावर्ती कस्बे के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और प्रकृति के एक अद्भुत संगम के रूप में होनी चाहिए और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।

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