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चंपत राय का 'विकल्प' बनने चले थे स्वामी गोविंद देव गिरि, एक तीखे सवाल ने खोल दी पोल

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अयोध्या से ग्राउंड रिपोर्ट: राम मंदिर ट्रस्ट में 'क्रेडिट' की होड़ और आंतरिक कलह उजागर, सवाल पूछने पर भड़के कोषाध्यक्ष

अयोध्या। राम मंदिर निर्माण और उसके प्रबंधन को लेकर श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के भीतर की रार अब खुलकर सड़क पर आ गई है। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के कथित अड़ियल रवैये और उसके बाद कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हुए हंगामे ने यह साफ कर दिया है कि ट्रस्ट के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

Swami Govind Dev Giri


चंपत राय का 'लक्ष्मण रेखा' वाला घमंड?

सूत्रों और स्थानीय मीडिया के अनुसार, ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने मीडिया और आम जनता के संवाद के बीच एक ऐसी 'लक्ष्मण रेखा' खींच दी थी, जिसने पारदर्शिता पर ही ताला लगा दिया। मीडिया को दरकिनार करते हुए यह संदेश देने की कोशिश की गई कि—"ना खाता ना बही, जो चंपत कहे वही सही!" मंदिर के मामलों को व्यक्तिगत जागीर की तरह चलाने के आरोपों के बीच जब जमीन या कोष से जुड़े कथित विवाद सामने आए, तो मीडिया आधिकारिक बयानों के लिए भटकती रही। लेकिन ट्रस्ट की ओर से सिर्फ चुप्पी और उपेक्षा ही हाथ लगी।

आपदा में अवसर: जब कोषाध्यक्ष बनने चले 'संकटमोचक'

चंपत राय की कार्यशैली को लेकर मीडिया में उपजे भारी गुस्से के बीच ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज ने एंट्री ली। लगा कि वे इस संकट को एक अवसर में बदलने आए हैं। उन्होंने मीडिया के सामने आकर दूध का दूध और पानी का पानी करने का बीड़ा उठाया। जगह-जगह बयान देना, प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाना और दान-पुण्य की जानकारी साझा करना—सब कुछ इस अंदाज में चल रहा था मानो वे खुद को ट्रस्ट का सबसे जिम्मेदार, जवाबदेह और चंपत राय के एकमात्र विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहते हों।

एक तीखे सवाल से उखड़ा धैर्य, प्रेस कॉन्फ्रेंस में हंगामा

स्वामी गोविंद देव गिरि का यह 'जिम्मेदार' रूप तब तक ही टिका रहा, जब तक सवाल उनकी सहूलियत के थे। जैसे ही एक मीडियाकर्मी ने उनके पद की गरिमा के अनुरूप सीधा और तीखा सवाल दाग दिया, वैसे ही महाराज का धैर्य जवाब दे गया।

सवाल था: "जब आप ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष (Treasurer) हैं और कोष में हेराफेरी या अनियमितता के आरोप लग रहे हैं, तो जिम्मेदारी सिर्फ चंपत राय की क्यों? कोषाध्यक्ष होने के नाते आप इस्तीफा क्यों नहीं देंगे?"

इस एक सवाल ने पूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस का माहौल बदल दिया। खुद को पारदर्शी दिखाने आए महाराज अचानक भड़क उठे। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, माइक पर हाथ मारा जाने लगा और उनके सहयोगियों ने पत्रकारों को पीछे धकेलना शुरू कर दिया। देखते ही देखते वहां मौजूद अन्य पत्रकारों ने भी इसी सवाल को दोहराना शुरू कर दिया कि आखिर आर्थिक गड़बड़ियों की जिम्मेदारी से कोषाध्यक्ष कैसे बच सकते हैं?

चमकने आए थे, घिर कर चले गए!

जो कोषाध्यक्ष चंपत राय के विकल्प के रूप में अपनी छवि चमकाने आए थे, वे खुद पत्रकारों के तीखे सवालों के जाल में फंस गए। इस हंगामे ने यह साबित कर दिया है कि जब बात जवाबदेही की आती है, तो ट्रस्ट का शीर्ष नेतृत्व सवालों से भागने का रास्ता ढूंढता है।

अब देखना यह होगा कि इस आंतरिक खींचतान और उजागर हुई गुटबाजी के बाद राम मंदिर ट्रस्ट अपनी साख बचाने के लिए क्या कदम उठाता है।

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