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जेल की सलाखों से निकलकर रोशन हुआ मासूम का भविष्य: कलेक्टर डॉ. संजय अलंग (Dr. Sanjay Alang) बने मसीहा

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मानवता की अनूठी मिसाल: बिलासपुर के तत्कालीन कलेक्टर डॉ. संजय अलंग ने उठाया जेल में रह रही मासूम बच्ची की परवरिश और पढ़ाई का जिम्मा

बिलासपुर/मध्यप्रदेश : समाज में जब भी संवेदनशीलता और मानवता की बात होती है, तो कुछ अधिकारी अपनी कार्यशैली से ऐसी मिसाल कायम कर जाते हैं जो प्रेरणा का स्त्रोत बन जाती है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में तत्कालीन कलेक्टर डॉ. संजय अलंग द्वारा उठाया गया एक मानवीय कदम आज भी लोगों के दिलों में जीवित है। उन्होंने एक कैदी की 6 साल की अनाथ बच्ची के जीवन को नया आकार देकर यह साबित कर दिया कि प्रशासनिक पदों पर बैठे व्यक्ति अगर चाहें तो किसी का पूरा भविष्य बदल सकते हैं।

जेल की सलाखों से निकलकर रोशन हुआ मासूम का भविष्य: कलेक्टर डॉ. संजय अलंग बने मसीहा

क्या था पूरा मामला?

यह वाकया तब सामने आया जब कलेक्टर डॉ. संजय अलंग केंद्रीय जेल के औचक निरीक्षण पर पहुँचे थे। निरीक्षण के दौरान उनकी नजर एक 6 साल की मासूम बच्ची पर पड़ी, जो अपने सजायाफ्ता पिता से लिपटकर फफक-फफक कर रो रही थी।

जब कलेक्टर साहब ने मामले की जानकारी ली, तो जो सच्चाई सामने आई, वह दिल को झकझोर देने वाली थी:

  • पिता की सजा: बच्ची के पिता एक गंभीर अपराध में सजा काट रहे थे। उन्होंने 5 साल की सजा पूरी कर ली थी और 5 साल की सजा अभी और बाकी थी।

  • माँ का साया उठा: जिस समय यह बच्ची महज 15 दिन की थी, तभी उसकी माँ का निधन हो गया था।

  • कोई मददगार नहीं: परिवार या रिश्तेदारी में बच्चे की देखभाल करने वाला कोई नहीं था, जिस कारण इस मासूम को मजबूरी में जेल की चारदीवारी के भीतर अपने कैदी पिता के साथ रहना पड़ रहा था।

प्रशासनिक संवेदनशीलता: जेल से स्कूल तक का सफर

एक मासूम बचपन को जेल की सलाखों के पीछे तड़पते देख कलेक्टर डॉ. संजय अलंग का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने बिना एक पल गंवाए तुरंत एक बड़ा और संवेदनशील फैसला लिया।

  1. घर ले गए मासूम को: कैदी पिता की अनुमति से कलेक्टर साहब उस बच्ची को अपने साथ अपने घर ले आए।

  2. बेहतर शिक्षा की शुरुआत: बच्ची का भविष्य सुरक्षित करने के लिए उसका एडमिशन प्रतिष्ठित जैन इंटरनेशनल स्कूल में कराया गया।

  3. हॉस्टल और केयरटेकर की व्यवस्था: बच्ची की पढ़ाई और देखभाल में कोई कमी न आए, इसके लिए उसे स्कूल के हॉस्टल में ही रखा गया और उसकी देखरेख के लिए एक विशेष केयरटेकर (देखभाल करने वाले) की नियुक्ति की गई।

  4. खुद उठाया सारा खर्च: इस पूरी व्यवस्था का आर्थिक बोझ किसी सरकारी योजना पर डालने के बजाय डॉ. संजय अलंग ने खुद अपने निजी खर्चे पर उठाया।

निष्कर्ष

आज के दौर में जब संवेदनशीलता और इंसानियत अक्सर पीछे छूटती नजर आती है, डॉ. संजय अलंग जैसे अधिकारियों के कार्य समाज को यह विश्वास दिलाते हैं कि मानवता अभी जीवित है। एक प्रशासनिक अधिकारी का यह कदम न केवल उस मासूम बच्ची के लिए वरदान साबित हुआ, बल्कि यह पूरे समाज और देश के प्रशासनिक तंत्र के लिए अनुकरणीय प्रेरणा भी है।

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